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वाह सरकार !

दिल्ली से एक खबर उड़ी है, काया पलट हो जायेगा .  एक लकीर से नीचे वाला मोबाइल पा जायेगा.  गाजीपुर का अनपढ़ कल्लू, दिन भर गाना गाता है.  भीख में मिली अठन्नी देके घर पर दाना लाता है .  दाना खाके बीवी बच्चे सुबक सुबक सो जाते हैं.  सर्दी की हर रात सिकुड़ कर कोने में ठुठुराते हैं. टूटी छत्त से जब बारिश का पानी अन्दर आता है. कल्लू बैठा सिर्फ मोबाइल देख देख मुस्काता है. 

बात सिर्फ लोकपाल की?

बात  लोकपाल  की  नहीं , बात  सतपाल  की  है . सतपाल  जो  एक  आम  हिन्दुस्तानी  है . जिसने  सर  झुका  कर  हिंदुस्तान  का  विभाजन  नियति  मान  लिया ,  जिसने  1984 के  दंगो   को  सियासी  मसला  समझने  की  भूल  कर  ली . जो  आज  भी  कश्मीर  को  अपने  दुःख  से  बड़ा  दुःख  मानता  आया , व्हो  आज  भी  माने  बैठा  हँ  की  सर्कार  को  मैंने  चुना  है , बिना  वोट  दिए . जिसके  लिए  पकिस्तान  से  बड़ा  दुश्मन  कोई  नहीं , जिसके  लिए  सरकारी  दफ्तर  घूस  देने  का  मंदिर  है , जिसने  आज  तक  कभी  हिम्मत  नहीं  की  नेता  जी  के  काफिले से आगे  बढ़ने की , जो  मानता ...

उफान से उभरा ये ब्लॉग

पिछले एक महीने से कुच्छ लिख नहीं पाया, ऐसा नहीं था की सोच नहीं रहा था, लेकिन वख्त ही नहीं मिला. कभी कभी वख्त न मिलना अच्छा रहता है, इसका निष्कर्ष ये है की मैं काफी व्यस्त था काम को लेकर. मन मैं उन्माद था, जोश था कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश लिए मैं जुटा हुआ था, तभी मुझे एक ठोकर लगी और तब समझ मैं आया की मैं शायद हाथ पाउ तेज़ी से मार रहा था, मुझे सोच समझ कर कदम बढ़ाने चाहिए. इसलिए थोडा आत्म चिंतन ज़रूरी है. ये ब्लॉग लिखना उसी का एक हिस्सा है. पिछले दीनौं मैं अपने एक परम मित्र से बतिया रहा था और मैं चाहता था की हम अपने आने वाले समाये को समझें और कुच्छ ऐसी जगह भी मेहनत करे  जहाँ आज तक सोचा ही नहीं. लेकिन मेरे मित्र जो मुझसे उम्र मैं बड़े हैं उन्होंने सलाह दी की उस ओर हमें नहीं चलना चाहिए क्यूंकि उस ओर सुना है बहुत बवाल है. हमारी कोई पोलिटिकल बेक नहीं है और न ही हमारा किसी बड़े उद्योगपति से उठाना बैठना है जो हमारे मदद करे. मैं सुनता रहा और एक बार उनकी बात मान भी गया की शायद हमें उस नामुमकिन काम को नहीं करना चाहिए. पैर तुरंत मेरे मन ने मुझसे सवाल किया और मैंने उनसे पूछ लिया की उन्होंने खुद...

खलिश

रुक कहाँ चला? ये जगह ह।ेगी आबाद कल । जा ।

टीवी की माया

पिछले कई दिनौं से सोच रहा था की आखिर मैं क्योँ अपना ब्लॉग नहीं लिख रहा हूँ. फिर मेरे दिमाग ने उसका उत्तर देदिया की दुनिया मैं आज कल वैसे भी उथल पुथल कम है कौन सा मेरे ब्लॉग लिख देने से वोह उथल पुथल उलट फेर मैं बदल जाएगी? लेकिन इस बात की गारंटी क्या है की मेरे ब्लॉग मैं वोह ताकत नहीं की वोह पूरी दुनिया ही उलट पलट कर दे. क्या पता कर दे? गाहे बगाहे कोई भूला भटका मेरे ब्लॉग को छु के चला जाता है पैर मुझे तोह है उम्मीद की एक दिन मैं भी सब बदल डालूँगा, मौका मिलते ही. आज कल मेरी सोच कुछ ऐसी हो चुकी है, जोश से परिपूर्ण. किसी भी युवा नए गानों पैर थिरकते लड़के से अपने को मैं कम नहीं आंकता, उसके पास उम्र है मेरे पास दिशा. जब तक उसे दिशा दिखेगी तब तक उम्र खो देगा, इसलिए मेरा पलड़ा भारी है. खैर पिछले दिनौं आई पि एल ने धूम मचा दी. मैदान पैर नहीं मैदान के बहार. मज़ा इसलिए आता है क्यूंकि अचानक ये छुट भैये मुद्दे हमारे जीवन के गंभीर मुद्दे बन जाते हैं, जीवन मरण के प्रश्नचिन्ह, या बनवा दिए जाते हैं. शारुख खान को एक मैदान पैर चौकीदार पैर चीखता दिखा दिया, उसका ऑडियो बजा दिया, चौकीदार के घर पहुच गए, उसक...

गया पखवाडा

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Shimla 2012 पिछले १० - १२ दिन से सोच रहा था की अपना ब्लॉग अपडेट नहीं किया है. पैर व्यस्तता इतनी थी की नहीं कर पाया. व्यस्तता से ज्यादा कोई मुद्दा नहीं मिला की उसपर अपने विचार रख सकूं. वैसे मुद्दा तोह अभी भी नहीं है. पैर छोटे छोटे मुद्दौं से भी ब्लॉग लिखा जा सकता है. पिछले दिनौं शुरू हुए सत्यमेव जयते पर कई लोगौं ने टिपण्णी की और उसे सराहा कई ने उसे एक सिरे से ख़ारिज कर दिया, किसी ने इसे आमिर के लालच की रणनीति  का नाम दिया तो किसी ने उनकी समाज की ओरे कर्त्तव्य की सराहना की. मुझे इस बारे मैं कुच्छ भी कहना जल्दबाजी लगा इसलिए अपनी राय और टिप्पणियां मैं समाये आने पर दूंगा लेकिन ये बात भी सही है की जब भी कोई ख़ास आदमी हमारे मुद्दौं पर बात छेड़ता है तोह हम उसके पीछे पीछे चल देते हैं एक वफादार बन्दर की तरह. और हमें लगने लता है की कृष्ण भगवन ने वापस जनम लेलिया. अन्ना को भी अन्ना हम ने बनाया, बिचारे उम्र के आखरी पड़ाव पर आके लोगौं के दिल मैं जगह बना पाए. कोशिश तोह सदियौं से जारी थी पर इतनी बड़ी सफलता की खुद उनको अपेक्षा नहीं थी, हमारी उमीदोउन पर वोह खरे नहीं उतरे क्यूंकि हम ने सोच...

गया हफ्ता

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Viveck गया हफ्ता अच्छा रहा. गया हफ्ता मतलब २०१२ के अप्रैल महीने का आखरी हफ्ता. कुछ बढ़िया बातें हुई. मसलन विक्की डोनर जैसे फिल्म को लोगौं ने सराहा. मैं भी गया अपने परिवार के साथ और सच मानिए मैं अचंभित और वशीभूत हो गया. सचमुच शूजित सरकार ने बेहतरीन फिल्म बनायीं है. जूही श्रीवास्तव की लेखे में बहुत लम्बे घोड़े की दौड़ दिखाई देती है, जो आने वाले समाये में तो  थमने वाली नहीं है. कमाल बात ये है की शूजित दा ने ये जो कहानी चुनी वोह बहुत नाज़ुक विषय है, और हो सकता था की ये मोह ने बल गिरते लेकिन उन्होंने वोह रिस्क लिया और भाई वाह ग़जब रिस्क लिया. दूसरा उनकी स्टार कास्ट जो असल में थी ही नहीं, आयुष्मान खुराना को फिल्म देखने वाले लोग नहीं जानते, उसे और वोह नई फुलझड़ी को देखने लोग क्योँ जाते. लेकिन भाईसाहब गए देखने लोग. ये कमाल की ही बात है. इससे ये सबक मिलता है की आपकी स्टार कास्ट नहीं, आपकी स्क्रिप्ट लोगो को सिनेमा हाल में ले जाती है. आप अच्छी  फिल्म बनायेंगे तो लोग देखने आयेंगे. फ़िल्म में दिल्ली की बहुत प्यारी सी तस्वीर है और बंगाली - पंजाबी की भिन्नता पर महा कत्ताक्ष है जो सच ...