टीवी की माया


पिछले कई दिनौं से सोच रहा था की आखिर मैं क्योँ अपना ब्लॉग नहीं लिख रहा हूँ. फिर मेरे दिमाग ने उसका उत्तर देदिया की दुनिया मैं आज कल वैसे भी उथल पुथल कम है कौन सा मेरे ब्लॉग लिख देने से वोह उथल पुथल उलट फेर मैं बदल जाएगी? लेकिन इस बात की गारंटी क्या है की मेरे ब्लॉग मैं वोह ताकत नहीं की वोह पूरी दुनिया ही उलट पलट कर दे. क्या पता कर दे? गाहे बगाहे कोई भूला भटका मेरे ब्लॉग को छु के चला जाता है पैर मुझे तोह है उम्मीद की एक दिन मैं भी सब बदल डालूँगा, मौका मिलते ही.
आज कल मेरी सोच कुछ ऐसी हो चुकी है, जोश से परिपूर्ण. किसी भी युवा नए गानों पैर थिरकते लड़के से अपने को मैं कम नहीं आंकता, उसके पास उम्र है मेरे पास दिशा. जब तक उसे दिशा दिखेगी तब तक उम्र खो देगा, इसलिए मेरा पलड़ा भारी है.
खैर पिछले दिनौं आई पि एल ने धूम मचा दी. मैदान पैर नहीं मैदान के बहार. मज़ा इसलिए आता है क्यूंकि अचानक ये छुट भैये मुद्दे हमारे जीवन के गंभीर मुद्दे बन जाते हैं, जीवन मरण के प्रश्नचिन्ह, या बनवा दिए जाते हैं. शारुख खान को एक मैदान पैर चौकीदार पैर चीखता दिखा दिया, उसका ऑडियो बजा दिया, चौकीदार के घर पहुच गए, उसकी जीवनी लिख डाली. बवाल माच गया. अभी वोह थमा भी नहीं था की एक गोरी औरत को किसी विदेशी खिलाड़ी ने प्रताड़ित कर दिया. कोर्ट कचेहरी हुआ. अभी ये चल ही रहा था की कई लोग दृग्स की रवे पार्टी मैं धर लिए गए. पोलिसे सेलेब्रिटी शराब होटल सब हुआ, लगा लोग सही कहते हैं की २०१२ मैं दुनिया ख़त्म हो जाएगी. ये सभी मुद्दे हमारे लिए रात की रोटी और सुबह का नाश्ता बन गए. दिल घबराने लगता था की अब क्या होगा. लेकिन अचानक सब ठीक. जैसे कुच्छ हुआ ही न हो. कौन सा चौकीदार? कौन सी गोरी लड़की, कौन सा होटल और कौन सी खबर? सब घायब.
दुःख ये है की जब से टी वि का खेल चला है हम को पिछाड देने की साजिश सी चल पड़ी है. हमारी पत्रकारिता इस मुहीम पैर चल पड़ी है की हम कितने नीचे गिर सकते हैं. व्यर्थ की ख़बरें मसाला laga लगा के हम कितना पका सकते हैं.

अफ़सोस होता है की हम क्योँ नहीं समझ पा रहे की हमको धकेला जा रहा है. और सबसे बड़े धोकेबाज एन डी टीवी वाले . वोह एक दम अलग ही राह पकड़ लेते हैं. अपने को अनोखा साबित करने के लिए.
पहले दूरदर्शन अत था जो हमारे समाज और हमारी समझ दोनों को थोडा आगे लगाया. उसके बाद कई और टीवी चैनल आये जो हमारी सोच को उफान पैर ले गए. फिर दूरदर्शन देखने पैर लगता था की ये पिछड़ा है. लेकिन टीवी चैनल होड़ मैं लग गए और समाज को इस्तेमाल करंस शुरू कर दिया और अब दूरदर्शन का राज्य सभा चैनल देख के लता है की वह कुछ नया है. नया असल मैं है नहीं लेकिन ठहराव है.
अभी भी समय है हमें जागना होगा. नहीं तोह मोटेक सिंह अहलूवालिया ३५ लाख का गुसलखाना बनवाते रहेंगे और अभिषेक मनु सिंघवी अपने कोर्ट के केबिन मैं लेटे  रहेंगे. खुद भी जागिये उन्हें भी जगाईये

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