Gen- Z का खौफ
कल एक ऑटोवाले से बहस हो गई। वो मर्गिल्ला-सा, टाइट जीन्स पहने, जुल्फ़ों का छज्जा बनाकर, गुटखा दाँतों में पीसता एक छुहारा-नुमा हड्डी का ढाँचा था। जिस जगह जाने के रोज़ 40 रुपये लगते हैं, वहाँ ये छिलका 150 माँग रहा था। मैंने आदतन पूछ लिया "क्यों भाई?" उसने ऐसे घूरा जैसे मैंने किराया नहीं, उसके सजीव होने का सबूत माँग लिया हो। बोला, ”ए अंकल, शानपट्टी नक्को। जैन जी है मैं, जैन जी।" उसके बैंगनी रंग वाले चेहरे में धँसी लाल आँखें बाहर गिरने को आतुर थीं। मुझे उस पर हँसी आ गई। मैंने पूछा, "वो क्या होता है?" अब वह और उत्तेजित हो गया। "इष्टा ग्राम नहीं देखता क्या?" वह शायद Gen-Z कहना चाह रहा था, मुझे डराने के चक्कर में उसका चेहरा और मनोरंजक होता जा रहा था। अभी पट्ठा ज़िंदगी के उस पड़ाव पर था जब उसे यह ज्ञान नहीं था कि जीवन के नृत्य में कौन सी मुद्रा कहाँ पेश करनी है। जहाँ असंयुक्त हस्त से काम चल जाता, वहाँ वह संयुक्त हस्त का इस्तेमाल कर रहा था। उससे बहस करना समय नष्ट करना था। पैसे देकर मैंने जान छुड़ाई। चलते-चलते मुझे अपना ही एक किस्सा याद आ गया। हम भी ऐसे ही थ...