गया पखवाडा


Shimla 2012


पिछले १० - १२ दिन से सोच रहा था की अपना ब्लॉग अपडेट नहीं किया है. पैर व्यस्तता इतनी थी की नहीं कर पाया. व्यस्तता से ज्यादा कोई मुद्दा नहीं मिला की उसपर अपने विचार रख सकूं. वैसे मुद्दा तोह अभी भी नहीं है. पैर छोटे छोटे मुद्दौं से भी ब्लॉग लिखा जा सकता है. पिछले दिनौं शुरू हुए सत्यमेव जयते पर कई लोगौं ने टिपण्णी की और उसे सराहा कई ने उसे एक सिरे से ख़ारिज कर दिया, किसी ने इसे आमिर के लालच की रणनीति  का नाम दिया तो किसी ने उनकी समाज की ओरे कर्त्तव्य की सराहना की. मुझे इस बारे मैं कुच्छ भी कहना जल्दबाजी लगा इसलिए अपनी राय और टिप्पणियां मैं समाये आने पर दूंगा लेकिन ये बात भी सही है की जब भी कोई ख़ास आदमी हमारे मुद्दौं पर बात छेड़ता है तोह हम उसके पीछे पीछे चल देते हैं एक वफादार बन्दर की तरह. और हमें लगने लता है की कृष्ण भगवन ने वापस जनम लेलिया. अन्ना को भी अन्ना हम ने बनाया, बिचारे उम्र के आखरी पड़ाव पर आके लोगौं के दिल मैं जगह बना पाए. कोशिश तोह सदियौं से जारी थी पर इतनी बड़ी सफलता की खुद उनको अपेक्षा नहीं थी, हमारी उमीदोउन पर वोह खरे नहीं उतरे क्यूंकि हम ने सोचा अन्ना तोह रातौं रात देश बदल देंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं और हमने उनके बारे मैं बात करनी कम कर दी. अब आमिर अगये, हमें फिर लग रहा है की बस यही है जो हमारी डूबती नैया पार लगा सकता है. लेकिन हम इतने अन्ध्विन्श्वास से घिरे हैं की आज तक हमने देखा नहीं की सत्यमेव जयते जैसे प्रोग्रम्म काफी पहले से टीवी दिखता रहा है. लेकिन हमने एक कान से निकला दुसरे से छीनक दिया. ये हमारी आदत है. मैं ये नहीं कह रहा क आमिर का प्रयास प्रशंसनीय नहीं है, और न ही मैं आमिर का दीवाना हों. मेरे हिसाब से वोह एक व्यवसायी है और जानते हैं की कौन सा प्रोडक्ट चलेगा. दूरदर्शिता है. धर्मशाला खोलने कोई नै आया न ही इतने सालौं की बनायीं इज्ज़त को वोह daun पर लगाने आये हैं. लेकिन हमें दिल से ज्यादा उनको दिमाग से समझना चाहिए. प्रोग्रम्म ख़तम होते ही हम एक sms करते हैं और अपनी जिमेदारी से मुक्त हो जाते हैं. खैर ये तोह वख्त आने पर ही पता चलेगा की आमिर का ये नया प्रोग्रम्म जायेगा कहाँ. मंशा उनकी जो भी हो कर तोह भला ही रहे हैं
एक और चीज़ जिसने लोगौं को बात करने का मौका दिया वोह था Ashton Kutcher  का एक विज्ञापन जिसमें वो एक हिन्दुस्तानी बने थे. लोग भड़क गए की ऐसा Kutcher ने क्योँ किया? लेकिन उस विज्ञापन मैं ऐसा था क्या? हम लोग दूस्रौं पर तोह फब्तियां कसते बाज नहीं आते और दुसरे फब्ती कसें तोह हमें आपति है. मुझे तोह उस विज्ञापन से कोई आपत्ती नहीं है. हाँ ये ज़रूर है की एक्टर अगर उसमें ज्यादा बेहतरीन  अभिनय करता तोह और मज़ा आता. पता नहीं क्योँ हम हिन्दुस्तानी हंसने की वजह पर ही पाबंद लगाने पर तुले हैं. हमने खुल के हंसने पर इतनी परेशानी क्योँ हो रही है. कहीं हम परेशां होने के ज़रिये तलाशने मैं तोह नहीं जुट गए, उसकी आदत तोह नहीं  पड़ती जा रही? और हम तोह सदा से अन्ग्रेजौं का मज़ाक ही उड़ाते आये हैं, अपनी फ़िल्में उठा के ही देख लीजिये. तोह अगर अँगरेज़ नयूदा दिया हमारा मज़ाक तोह कौनसा पहाड़ टूट गया? खुद पर हँसना हम कैसे भूल गए. वोह तो एक गहरे और संयम से लबालब इंसान की निशानी है 

हंसिये और सबसे पहले आईने पर हंसिये. हम भी खुश रहेंगे और सब भी खुश रहेंगे . और बातें होंगी इसी लेख के अगले हिस्से में

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