उफान से उभरा ये ब्लॉग
पिछले एक महीने से कुच्छ लिख नहीं पाया, ऐसा नहीं था की सोच नहीं रहा था, लेकिन वख्त ही नहीं मिला. कभी कभी वख्त न मिलना अच्छा रहता है, इसका निष्कर्ष ये है की मैं काफी व्यस्त था काम को लेकर. मन मैं उन्माद था, जोश था कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश लिए मैं जुटा हुआ था, तभी मुझे एक ठोकर लगी और तब समझ मैं आया की मैं शायद हाथ पाउ तेज़ी से मार रहा था, मुझे सोच समझ कर कदम बढ़ाने चाहिए. इसलिए थोडा आत्म चिंतन ज़रूरी है. ये ब्लॉग लिखना उसी का एक हिस्सा है.
पिछले दीनौं मैं अपने एक परम मित्र से बतिया रहा था और मैं चाहता था की हम अपने आने वाले समाये को समझें और कुच्छ ऐसी जगह भी मेहनत करे जहाँ आज तक सोचा ही नहीं. लेकिन मेरे मित्र जो मुझसे उम्र मैं बड़े हैं उन्होंने सलाह दी की उस ओर हमें नहीं चलना चाहिए क्यूंकि उस ओर सुना है बहुत बवाल है. हमारी कोई पोलिटिकल बेक नहीं है और न ही हमारा किसी बड़े उद्योगपति से उठाना बैठना है जो हमारे मदद करे. मैं सुनता रहा और एक बार उनकी बात मान भी गया की शायद हमें उस नामुमकिन काम को नहीं करना चाहिए. पैर तुरंत मेरे मन ने मुझसे सवाल किया और मैंने उनसे पूछ लिया की उन्होंने खुद ये महसूस किया है की किसी से सुना है. पता चला उन्होंने किसी से सुना है, खुद कभी महसूस नहीं किया. मुझे अजीब लगा, क्यूंकि अगर ये काम नामुमकिन है तोह भी मैं पूरी कोशिश करूंगा की ये मुमकिन हो जाए और अगर न भी हुआ तब भी मुझे ये मलाल नहीं रहेगा की मैंने कोशिश नहीं की. मैंने उन्हें के मन गढ़ंत कहानी सुना दी. मैंने उनेहं बताया की एक बार एक आदमी जंगले मैं जा रहा था, एक जगह पंहुचा तोह वहां दो रस्ते जाते थे , एक रस्ते पैर एक लड़का खड़ा था जो उस रस्ते पैर जाने वाले लोगौं को मन कर रहा था की इस रस्ते मत जाना वहां पानी है डूब जाओगे. तोह आदमी सीधे रस्ते पैर चलता रहा. घूम फिर के फिर वहीं आ पंहुचा. लेकिन फिर लड़के ने उसे दुसरे रस्ते न जाने की सलाह दी. वोह फिर सीधा चल पड़ा. लेकिन फिर वहीं जा पंहुचा, ऐसा करते करते उसे कई दिन बीत गए, उसका समय बर्बाद हुआ, वोह यही सोचता रहा शायद वोह उस मुकाम पैर पहुच ही नहीं पायेगा. जब थक गया तोह उसने उस लड़के की बात अनसुनी की और अपनी बुद्धि लगायी. उसने सोचा की उसे ये पता है की सीधा रास्ता कहीं नहीं जाता, उसके पास दो चारे थे, या तोह वोह वापस चला जाए, या फिर डूबने के लिए अपने को टायर कर ले. वोह डूबने के लिए तैयार था. और लड़के की बात अनसुना कर वोह दुसरे रस्ते पैर चल पड़ा. पानी था, पैर घुटनों से नीचे. वोह और आगे बढ़ा, बढ़ता गया, फिसला, सम्हला, पैर डूबा नहीं. और फिर पीछे मुद कर नहीं देखा. और अपने मुकाम पैर पहुच गया. उसको सिर्फ ये बात याद आई की ये काम काश वोह पहले कर लेता. और उस लड़के की बात पैर विश्वास नहीं करता, उसका वख्त बचता. वोह लड़का भी ग़लत नहीं था. वोह सही कह रहा था, क्यूंकि उसकी कद काठी छोटी थी, उसके लिए पानी घुतनौं से ऊपर ही था. इसलिए ये ज़रूरी है की आप अपनी क्षमता के हिस्साब से चलें, कोशिश तोह करें. फिर तै करें की आप कितने पानी मैं है. बिना पानी मैं उतरे उसकी गहराई किसी दुसरे की कद काठी से कैसे माप लेंगे?
मेरे मित्र मुझसे सहमत थे.
हर चीज़ का वख्त होता है, जब ये अकल आती है तब ये नहीं समझना चाहिए की देर से आई, ये समझ जाना चाहिए की आपका सफ़र थोडा लम्बा था.
पिछले दीनौं मैं अपने एक परम मित्र से बतिया रहा था और मैं चाहता था की हम अपने आने वाले समाये को समझें और कुच्छ ऐसी जगह भी मेहनत करे जहाँ आज तक सोचा ही नहीं. लेकिन मेरे मित्र जो मुझसे उम्र मैं बड़े हैं उन्होंने सलाह दी की उस ओर हमें नहीं चलना चाहिए क्यूंकि उस ओर सुना है बहुत बवाल है. हमारी कोई पोलिटिकल बेक नहीं है और न ही हमारा किसी बड़े उद्योगपति से उठाना बैठना है जो हमारे मदद करे. मैं सुनता रहा और एक बार उनकी बात मान भी गया की शायद हमें उस नामुमकिन काम को नहीं करना चाहिए. पैर तुरंत मेरे मन ने मुझसे सवाल किया और मैंने उनसे पूछ लिया की उन्होंने खुद ये महसूस किया है की किसी से सुना है. पता चला उन्होंने किसी से सुना है, खुद कभी महसूस नहीं किया. मुझे अजीब लगा, क्यूंकि अगर ये काम नामुमकिन है तोह भी मैं पूरी कोशिश करूंगा की ये मुमकिन हो जाए और अगर न भी हुआ तब भी मुझे ये मलाल नहीं रहेगा की मैंने कोशिश नहीं की. मैंने उन्हें के मन गढ़ंत कहानी सुना दी. मैंने उनेहं बताया की एक बार एक आदमी जंगले मैं जा रहा था, एक जगह पंहुचा तोह वहां दो रस्ते जाते थे , एक रस्ते पैर एक लड़का खड़ा था जो उस रस्ते पैर जाने वाले लोगौं को मन कर रहा था की इस रस्ते मत जाना वहां पानी है डूब जाओगे. तोह आदमी सीधे रस्ते पैर चलता रहा. घूम फिर के फिर वहीं आ पंहुचा. लेकिन फिर लड़के ने उसे दुसरे रस्ते न जाने की सलाह दी. वोह फिर सीधा चल पड़ा. लेकिन फिर वहीं जा पंहुचा, ऐसा करते करते उसे कई दिन बीत गए, उसका समय बर्बाद हुआ, वोह यही सोचता रहा शायद वोह उस मुकाम पैर पहुच ही नहीं पायेगा. जब थक गया तोह उसने उस लड़के की बात अनसुनी की और अपनी बुद्धि लगायी. उसने सोचा की उसे ये पता है की सीधा रास्ता कहीं नहीं जाता, उसके पास दो चारे थे, या तोह वोह वापस चला जाए, या फिर डूबने के लिए अपने को टायर कर ले. वोह डूबने के लिए तैयार था. और लड़के की बात अनसुना कर वोह दुसरे रस्ते पैर चल पड़ा. पानी था, पैर घुटनों से नीचे. वोह और आगे बढ़ा, बढ़ता गया, फिसला, सम्हला, पैर डूबा नहीं. और फिर पीछे मुद कर नहीं देखा. और अपने मुकाम पैर पहुच गया. उसको सिर्फ ये बात याद आई की ये काम काश वोह पहले कर लेता. और उस लड़के की बात पैर विश्वास नहीं करता, उसका वख्त बचता. वोह लड़का भी ग़लत नहीं था. वोह सही कह रहा था, क्यूंकि उसकी कद काठी छोटी थी, उसके लिए पानी घुतनौं से ऊपर ही था. इसलिए ये ज़रूरी है की आप अपनी क्षमता के हिस्साब से चलें, कोशिश तोह करें. फिर तै करें की आप कितने पानी मैं है. बिना पानी मैं उतरे उसकी गहराई किसी दुसरे की कद काठी से कैसे माप लेंगे?
मेरे मित्र मुझसे सहमत थे.
हर चीज़ का वख्त होता है, जब ये अकल आती है तब ये नहीं समझना चाहिए की देर से आई, ये समझ जाना चाहिए की आपका सफ़र थोडा लम्बा था.
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