बात सिर्फ लोकपाल की?
बात लोकपाल की नहीं , बात सतपाल की है . सतपाल जो एक आम हिन्दुस्तानी है . जिसने सर झुका कर हिंदुस्तान का विभाजन नियति मान लिया , जिसने 1984 के दंगो को सियासी मसला समझने की भूल कर ली . जो आज भी कश्मीर को अपने दुःख से बड़ा दुःख मानता आया , व्हो आज भी माने बैठा हँ की सर्कार को मैंने चुना है , बिना वोट दिए . जिसके लिए पकिस्तान से बड़ा दुश्मन कोई नहीं , जिसके लिए सरकारी दफ्तर घूस देने का मंदिर है , जिसने आज तक कभी हिम्मत नहीं की नेता जी के काफिले से आगे बढ़ने की , जो मानता आया अभिषेक मनु सिंघवी अपने केबिन मैं काम कर रहे हैं , जो समझा संसद मैं कानून बनता है. ज़िन्दगी उसने इसी ख़ुशी मैं गुज़ार दी की उसने इंदिरा गाँधी को देखा है , जिसका सीना चौड़ा सिर्फ इस बात से होता है की हमने जेरो दिया संसार को . फिल्मौं मैं नाचते हीरो के सपने पूरा होता देख व्हो अपने सपने पूरा होता मान लेता है , अपने आने वाले वख्त के लिए जंतर मंतर पैर बैठे कुच्छ लोगौं को देख के भी व्हो अनदेखा कर देता है , भूक से मर रहे अरविन्द केजरीवाल को व्हो पागल समझता है . बात लोकपाल की नहीं बात सतपाल की है , तेजपाल की है , इकबाल की है , शर्मा , गुप्ता , सिंह , कुरैशी , D’सौजा , दुबे , सबकी है , उन सबकी जो हिंदुस्तान के कोने कोने , गली गली , नुक्कड़ बाज़ार मैं तैरते रहते हैं , रेग्नते रहते हैं . बात मेरी है , बात आपकी है .
Comments
Post a Comment