गया हफ्ता


Viveck

गया हफ्ता अच्छा रहा. गया हफ्ता मतलब २०१२ के अप्रैल महीने का आखरी हफ्ता. कुछ बढ़िया बातें हुई. मसलन विक्की डोनर जैसे फिल्म को लोगौं ने सराहा. मैं भी गया अपने परिवार के साथ और सच मानिए मैं अचंभित और वशीभूत हो गया. सचमुच शूजित सरकार ने बेहतरीन फिल्म बनायीं है. जूही श्रीवास्तव की लेखे में बहुत लम्बे घोड़े की दौड़ दिखाई देती है, जो आने वाले समाये में तो  थमने वाली नहीं है. कमाल बात ये है की शूजित दा ने ये जो कहानी चुनी वोह बहुत नाज़ुक विषय है, और हो सकता था की ये मोह ने बल गिरते लेकिन उन्होंने वोह रिस्क लिया और भाई वाह ग़जब रिस्क लिया. दूसरा उनकी स्टार कास्ट जो असल में थी ही नहीं, आयुष्मान खुराना को फिल्म देखने वाले लोग नहीं जानते, उसे और वोह नई फुलझड़ी को देखने लोग क्योँ जाते. लेकिन भाईसाहब गए देखने लोग. ये कमाल की ही बात है. इससे ये सबक मिलता है की आपकी स्टार कास्ट नहीं, आपकी स्क्रिप्ट लोगो को सिनेमा हाल में ले जाती है. आप अच्छी  फिल्म बनायेंगे तो लोग देखने आयेंगे. फ़िल्म में दिल्ली की बहुत प्यारी सी तस्वीर है और बंगाली - पंजाबी की भिन्नता पर महा कत्ताक्ष है जो सच है. फिल्म  का अंत भले उतना दिलचस्प नहीं था लेकिन मुझे बहुत मज़ा आया.  हर इंसान जिस माहौल में पला बाधा हो उसकी कमियां नहीं देख पता क्यूंकि उसे वोह पता ही नहीं चलती, जो किसी दुसरे माहौल में रहने वाले को अजीब लगे वह आपको नोर्मल लगेगा क्यूंकि आपने उस "अलग" चीज़ को वैसा ही देखा है, lekin बंगाली होते हुए सुजित दा ने अपने माहौल को भी बाहरी नज़र से देखा और ये भी काबिले तारीफ है. उम्मीद है की दिबंकर बनर्जी और सुजित सरकार जैसे लोगौं को हम जल्द ही महान फिल्म निर्देशक की सूची में पायेंगे. इन सभी पर नज़र रखनी पड़ेगी क्यूंकि इम्तियाज़ अली के साथ साथ ये दोनों भी आने वाले दिनौं में चमत्कार करने वाले हैं. उम्मीद to यही है. पर हाँ उम्मीद मुझे jhon  इब्राहीम से कत्तई नै थी की वह ऐसी अनोखी फिल्म के निर्माण से अपने निर्माता होने का परिचय देंगे, मेरा नजरिया उनकी ओरे बदला है. मैं अब jhon को आने वाले अच्छे निर्मतौं में गिनूंगा. वैसे मुझे jhon से इसलिए उम्मीद नहीं थी क्यूंकि मैंने उससे पिछले हफ्ते हाउसफुल- २ देख ली थी. फराह खान और साजिद खान दोनों भाई बहिन शायद पब्लिक के दिमाग को काफी फॉर ग्रांटेड लेते हैं. हाउसफुल - २ से वैसे मुझे कोई उम्मीद नहीं थी लेकिन साजिद खान जिस तरह की फिल्म बनाते हैं वह कहीं न कहीं हिन्दुस्तानी सिनेमा के स्तर को नीचा कर देता है. हो सकता है हाउसफुल जैसे फिल्म्स कुच्छ लोगौं को पसंद आती हों और वह इसलिए हँसते हों की उन्हें किसी भी बात पर हंसने का बस एक मौका चाहिए, लेकिन अगर इतने पैसे लगा कर आप एक फिल्म बनाते हैं तोह कम से कम कुच्छ उद्धार कीजिये, कॉमेडी बनाओ पर स्तर न गिराओ भाई. कई ऐसे निर्देशक होंगे जो पैसे की कमी के कारन मर गए लेकिन फिल्म न बना पाए, उन्हें मौका मिलता तोह शायद आज हिन्दुस्तानी सिनेमा को न जाने कितनी बढ़िया फिल्म्स दे गए होते, लेकिन साजिद मियां आपको मौका मिला है, आप उसपर घमंड मत करो, अब कुछ अच्छा भी बनाओ. 
खैर मेरी नाराज़गी साजिद खान की फिल्म से नहीं है. वह तोह वही बनाते हैं जितनी उन्हें समझ है. और हम जनता भी इसी लिए उस फिल्म को हिट कराती है बार बार जाती है क्यूंकि हमें भी उतनी ही समझ है. पर मुझे एक बात समझ नहीं आती की हमारी जो समझ है वह नेता चुनते वख्त कहाँ घास चरने जाती है? में अचानक मुद्दे से नहीं भटका, में सिर्फ पिछले हफ्ते का सार लिख रहा हूँ, और उसमें अभिषेक मनु सिंघवी के कृत्या की चर्चा करना बहुत ज़रूरी है. उन्होंने जो किया वह उनका "पेरसोनल" मामला है. लेकिन क्या आप उस आदमी को वापस टीवी पर किसी मुद्दे पर कांग्रेस का बचाव करते देख पाओगे? असल में ये लोग सदियौं से ऐसा करते आये हैं. अपने "पेरसोनल" फायेदे के लिए लोगौं का इस्तेमाल. यहाँ वह शारीरिक इच्छा पूरी करते पकडे गए. लेकिन वह बुरा आदमी है, इसलिए क्योँ की वह "पकड़ा" गया. लेकिन बाकी सब का क्या? भाई साहब असल में वह भी ऐसे ही हैं. और फिर यही कहूँगा ये कृत्या ये लोग सदियौं से करते आये हैं. इन्हें पता है जनता मंदबुद्धि है. में मीटिंग में "busy " हूँ बोल दूंगा तोह जनता मुझे तंग नै करेगी, क्योँ की में नेता हूँ. लेकिन इस पूरे काण्ड से ये बाद उजागर हो गयी की सत्ता धारी तोह है ही चोर, विपक्ष भी पंगु है. इतना बेकार विपक्ष मैंने आज तक नहीं देखा. किसी भी समाज और देश के लिए ज़रूरी है की उसका विपक्ष powerful  हो, यहाँ तोह रीढ़ की हड्डी ही गायब है. ऐसा लगा मानो कोई नेता चाहे पक्ष का हो या विपक्ष का कोई इस मुद्दे पर चर्चा नहीं करना चाहता. जितना अभिषेक मनु सिंघवी इस मुद्दे को दबा रहा था उससे ज्यादा नेता लोग दबवा रहे थे. और तोह और ndtv जैसे चैनल अपनी सफाई पेश करते नज़र आये की हमने क्योँ ये खबर दबाई. पर मुद्दा ये है की आपने खबर दबाई. कारन क्या है? कारण ये की नेता और वह भी कांग्रेस से कौन पंगा ले? मुझे तोह कभी कभी लगता है की विपक्ष को दब्बू पाना दिखने के लिए सर्कार ही पालती है. सारे खर्चे सर्कार करेगी. सदन में ५५४ लोग सर्कार के होगे , अलग अलग पार्टी सिर्फ एक मुखौटा. मैंने इस दल का मुखौटा लगाया आप उस दल का लगा लो, जनता समझेगी की विपक्ष है लेकिन असल में अन्दर खाने कहानी कुच्छ और. विपक्ष है तोह छोटे छोटे मुद्दे उठाये टाइम टाइम से जिससे किसी को शक न हो. और टीवी चैनल वह तोह हैं ही जेब में और समय के चलते इन्टरनेट पर कण्ट्रोल भी लगवा देंगे. ज़िन्दगी आराम से कटेगी. असल में अभिषेक मनु सिंघवी वाले काण्ड में वह ही नागे नहीं हुए पूरी मीडिया और विपक्ष सामने अगया खुल के. इसका मतलब ये की केबिन के अन्दर सब नंगे होते हैं.
और क्यूंकि हमारे नेता केबिन में busy  हैं इसी लिए बहार निर्मल बाबा काम पे लगे हुए हैं. मीडिया जो सारा शाम बैठे उनकी पोल पट्टी खोलती है और उसके पास वख्त nai  अभिषेक मनु सिंघवी के काण्ड पर चर्चा करनेका वही दिन में निर्मल बाबा का advertisement  दिखती है. आज निर्मल बाबा हैं कल कोई और बाबा होंगे, ऐसा होता रहा है. असा राम बापू जैसे स्वांग रचयिता बाबा जी का किसने क्या बिगाड़ लिया, उनकी दूकान तोह आज भी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की पर है. क्यूंकि नेता केबिन में busy हैं.

खैर विक्की डोनर देखिये हंसिये, गुनगुनाईये और अगले चुनाव में सिर्फ एक भला इस देश पर कर दीजिये, सिर्फ "वोट" दाल दीजिये.

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