पुरानी किताब का बचा किस्सा (पार्ट 2)



……..अगले दिन स्कूल पहुँचा तो बिट्टू सरदार ने घेर लिया,

क्योँ बे, तू हमारी तरफ से गया था या उनकी तरफ से आया था?”

मैंने सफाई में कहा, “धमकी की बात हुई थी, वहाँ तो तुम हड्डियां तोड़ने लगे।


बिट्टू ने मुझे निकृष्ट नज़रों से देखा और चला गया। बाकी गुट वाले भी नज़रों-ही-नज़रों में मुझे तिरस्कृत कर गए। पंकज मिला, उसने मुझे सांत्वना दी और धन्यवाद भी किया कि मैंने उसे भागने में मदद की। पंकज सज्जन किस्म का व्यक्ति था, जाते-जाते पूछ गया, “लेकिन, तू आया किसकी तरफ से था?”


यह घटना धीरे-धीरे स्कूल में आग की तरह फैल गई। सबको पता चल गया कि कल हॉस्पिटल के पीछे की गली में क्या हुआ था, लेकिन इसके साथ यह सवाल भी तैरने लगा, मैं किस तरफ से गया था। अब तो यह संशय मुझे भी होने लगा था कि मैं दरअसल गया किस तरफ से था।


अब मुझे साबित करना था कि मैं बिट्टू सरदार का आदमी हूँ और इस गिरोह का महत्वपूर्ण सदस्य हूँ, प्लानिंग से लेकर एक्सेक्यूशन तक अपने आका का हुक्म बजा लाता हूँ। मैंने अपने ही गुट के एक मसखरे को पकड़ा और सत्तू, जो अपने गुर्गों के साथ शर्मिंदा घूम रहा था, उस पर फब्तियाँ कसनी शुरू कीं। फिल्मों में देख चुका था कि छुटभैये गुंडे कैसे फब्तियाँ कसते हैं, ही गया था तो धर्म पूरा करना था। हम सत्तू और उसके गुर्गों के सामने से फूहड़ सी हँसी हँसते निकले।


सत्तू ने टेढ़ी नज़रों से देखा, लेकिन कल की बेइज्जती ने उसे कुछ कहने से रोक लिया। बिट्टू सरदार को प्रभावित करने के लिए मुझे अपने चरित्र से समझौता करना पड़ा, क्योंकि मामला शिक्षा से जुड़ा था। दो-चार बार सत्तू के आगे ठहाके लगाए ताकि खबर बिट्टू तक पहुँचे। पर शायद ठहाके काफी नहीं थे, इस बार ताना भी मार दिया,

ठाकुर ने गब्बर से भिड़ने के लिए ------ की फ़ौज बुलाई थी।


सत्तू तमतमा गया। तीर निशाने पर लगा था। दाँत पीसकर अपने गुर्गों से खुसुर-फुसुर करने लगा। उसके चेहरे से प्लान टपक रहा था, क्या हम समय से पहले जश्न मना रहे थे?


हमारा स्कूल शुभखेड़ा की टीले नुमा पहाड़ी पर था। छुट्टी होते ही बच्चे साइकिल से ढलान मारते नीचे आते। ऊपर से पूरा पांवटा साफ दिखाई देता था। अब मेरा भी गिरोह था, इसलिए अब उनके साथ साथ जाना था। हम निकले, ढलान से पहले मेरी साइकिल की चैन उतर गई। मैं चैन लगाता रह गया और गिरोह काफी आगे निकल गया।


चैन ठीक कर जब वापस बैठा और सामने देखा तो होश उड़ गए, लगभग पचास लोग मेरे गिरोह पर टूट पड़े थे। जैसे दंगा हो गया हो, सादे कपड़ों में फौज गई हो। मेरे पास दो रास्ते थे, खेतों से घर निकल जाऊँ या पसलियाँ तुड़वाने पहुँचूँ। घर पहुँचने पर भी बचना नहीं था। आज सूली चढ़ना तय था।


तभी बिट्टू के शब्द कानों में पड़े, “तू पोंटा में फट्टू के नाम से मशहूर है।

आज साबित करना था, मैं फट्टू नहीं, योद्धा हूँ।


मैं साइकिल पर चढ़ा और चल पड़ा, दिमाग में मैं स्लो मोशन में चल रहा था, चेहरे पर मुस्कराहट लिए, जैसे कुर्बानी देने जा रहा हूँ। सोचा, कल पिताजी जब अपनी काली राजदूत पर गुजरेंगे तो लोग कहेंगे, “देखो, अपने गिरोह पर कुर्बान योद्धा का पिता।पिता जी का सीना चौड़ा हो जायेगा। शायद पांवटा वासी मेरे नाम का कोई चौक भी बनवा दें।


लेकिन वहाँ पहुँचा तो मारपीट बहस में बदल चुकी थी। मेरे शहीद होने का चांस भी जाता रहा.  मैं भीड़ का हिस्सा बन देख रहा था जैसे मेरा लेना-देना ही नहीं। 


तभी भीड़ में हलचल हुई, हमारे प्रिंसिपल साहब अपने बजाज स्कूटर पे आचुके थे और पूछताछ कर रहे थे। उन्हें देखते ही भीड़ छँटने लगी। उनके तीन दुश्मन थे, प्रेम प्रसंग, पढ़ाई में कमजोरी और गुंडई। उनकी घड़ी उतरती तो ज्वालामुखी फटता। मेरा कलेजा बैठ गया और मैं खिसक लिया। सबको पता था, अगले दिन क्या होगा।


अगले दिन स्कूल जाने के सारे पैंतरे आजमा लिए, पर घरवालों के आगे सब फेल। पहुँचना पड़ा। क्लास में बैठे थे कि प्रिंसिपल साहब की अतिविश्वसनीय जगीरो आंटी हमें लेने गईं। मैंने क्लास को आखिरी सलाम किया और चल पड़ा।


प्रिंसिपल के पास बड़ा डंडा रहता था, हर बार टूटता, सप्लाई कभी बंद नहीं होती। वही बढ़िया लकड़ी, लगते ही कानों में सुनहरी आवाजें आतीं। पांवटा के अधिकतर अभिभावक अपने बच्चों से पीड़ित उन्हें वह डंडे उपहार में देते थे, जो गुरु नानक मिशन पब्लिक स्कूल पांवटा साहिब में पढ़ा है, जानता है मैं अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग नहीं कर रहा।


ऑफिस पहुँचा, दोनों गुट मौजूद। बिट्टू, सत्तू, पंकज, सूर्य कुमार और बाकी। किराए के लड़के छोड़कर सब। सत्तू चिल्लाया, “सर, यही! इसी ली वजह से हुआ

सर ने पूछा, “क्या बोला तुमने?”

जगीरो आंटी गुरर्राईगब्बर ने किसकी फ़ौज बुलाई थी…?” मेरे तो काटो तो खून नहीं। 


तभी समझ आया, सत्तू खेल गया था। बिट्टू ऐसे खड़ा जैसे जानता ही हो। सत्तू फरियादी बन गया था और उँगली सिर्फ मेरी तरफ। इसका मतलब बिट्टू उस्ताद भी खेल गया था. 


काफी देर सुनने के बाद प्रिंसिपल ने फरमान दिया

अपने-अपने पिता को स्कूल बुलाओ।


पिता जी? असंभव। धरती फट जाए तो उसमें समां जाऊँ, पर पिता जी को स्कूल बुलाना, ना जी ना।


सत्तू बोला, “सर, मेरे तो पिता ही यहाँ नहीं रहते।

सर बोलेतो जब तक आएँ, असेंबली में हाथ ऊपर करके खड़े रहो।


मैंने राहत की साँस ली। साल भर खड़ा रहना मंजूर था, पर पिता जी का सर झुकना, ना जी ना. 


बिट्टू ने फोन किया, उसके पिता आए और वह क्लास में। बाकी भी निपट गए। अब बचे हम दो, मैं और सत्तू। हमें ऑफिस के बाहर खड़ा कर दिया गया। अब सत्तू और मैं ऑफिस के बाहर खड़े थे, जिनका मूलतः आपस में कोई झगड़ा था ही नहीं। बाकी सब वापस अपनी क्लास में जा चुके थे.   


आते-जाते बच्चे हमें खिल्ली उड़ाती नज़रों से देख रहे थे। सत्तू अपने अपमान से ज्यादा मेरे अपमान में खुश था, उसे स्कूल के बाहर कोई जानता नहीं था, मुझे सब जानते थे, क्यूंकि मैं पांवटा का निवासी था जगीरो आंटी हमें ऐसे देख रही थीं जैसे चिड़ियाघर के भालू का निरिक्षण कर रही हों। टीचर आपस में पूछ रहे थेये माइनिंग वाले तिवारी जी का बेटा है ? बताओ नाक कटा दी?”. ऐसा लग रहा था मानो हमें देखने दूर दूर से लोग रहे हैं. हम एक उदाहरण बन चुके थे. 


कुछ देर बाद सत्तू हँसकर बोला, “हाँ भाई, गब्बर ने किन लोगों की फ़ौज बुलाई थी?”

मन हुआ एक लगा दूँ, ऐसी क्या लग गयी दिल पर इसके। पर दोपहर तक हम दोस्त बन चुके थे।


दोपहर तक प्रिंसिपल भी पसीज गए और वार्निंग देकर छोड़ दिया। जाते-जाते सत्तू ने पूछा, किताबें मिलीं या नहीं। किताबें उसके पास भी थीं, उसने अगले दिन देने का वादा किया। हम हाथ मिलाकर अपनी-अपनी क्लास में चले गए।


उस दिन के बाद मैंने हमेशा नई किताबें ही खरीदीं।

सबक मिला, ये लाइन मेरे बस की नहीं थी।


बिट्टू, सत्तू और अल्पकालिक गिरोह के अन्य अस्थायी सदस्य आज पांवटा के प्रतिष्ठित लोग हैं। मुझे भी दो बार सम्मान मिल चुका है (इस किस्से के छपने से पहले तक) 


अगर  बिट्टू और सत्तू यह पढ़ें तो शायद उन्हें वह घटना याद जाये, हालाँकि मैंने उनकी प्रतिष्ठा के लिए नाम बदल दिए हैं।


खैर, यह गाथा यहीं खत्म होती है। सबक सिर्फ इतना है की इंसान को कभी कभी ज़्यादा नहीं उड़ना चाहिए। 


  • विवेक तिवारी 


नोट: आप इससे पहले का किस्सा (पार्ट 1) इस ब्लॉग पर पढ़ना चाहे पढ़ सकते हैं, मुझे सुखद अनुभव होगा.  


https://vivecktewari.blogspot.com/2026/02/1.html

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