पुरानी किताब का किस्सा (पार्ट 1)


 दसवीं की परीक्षा खत्म हो चुकी थी, ग्यारहवीं में दाखिला मिल चुका था। किताबों का चलन ऐसा था, कुछ लोग नई किताबें खरीदते, और जो ग्यारहवीं से बारहवीं में जाते, वे अपनी किताबें ग्यारहवीं वालों को दे देते। हमारे घर में रिवाज़ था कि नई किताबें ही ली जातीं। पिताजी बहुत सख्त थे, उनके हिसाब से किताबों की गरिमा होती है, उनकी खुशबू होती है, जो पढ़ने को प्रेरित करती है। बात सही थी; पता नहीं कौन-कौन सी किताब कहाँ-कहाँ से होकर आती है, अपने साथ वहाँ की दुर्गंध लिए कि मन ही न करे पढ़ने का।


शिक्षा में यह सब मायने रखता है, खासकर जब आपके दादाजी शिक्षक रहे हो, हों और माता-पिता अध्यात्म के पुजारी। आपमें अपने-आप शिक्षा के प्रति सम्मान जाग जाता है। लेकिन इतना सब होते हुए भी शिक्षा का मेरी तरफ रुझान मायूसी भरा था। मैं रुचि रखता था, पर शिक्षा मुझे तुच्छ नज़रों से देखती थी, मेरे हाथ आती ही नहीं थी। किसी तरह दसवीं निकाल दी, अब नई किताबों का सिलसिला शुरू हुआ।
मुझे लगा, वैसे भी शिक्षा मुझे पसंद नहीं करती, तो नई किताबें खरीदने में पिताजी के पैसे क्यों जाया करूँ। वैसे भी पिताजी मुझे पढ़ाने साल-छह महीने में ही बैठते थे, वह भी जब किसी की मरम्मत करनी हो; पिछले महीने ही मेरे पेंच कसे गए थे, तो अब पाँच महीने तो पढ़ाने से रहे। सोचा किसी से पुरानी किताबें लेकर उनके कुछ पैसे बचा दूँ, पाँच महीने बाद तो नयी पुरानी ही दिखेंगी।
मैं उस शख्स को तलाशने लगा। पता चला बाजार के रहने वाले हमारे सीनियर बिट्टू सरदार के पास किताबें हैं और अभी तक किसी को वादा नहीं की गईं। मैं तुरंत उनसे मिला और किताबों की बात रख दी। उन्होंने शाम को घर आने को कहा। मैं गया, उन्होंने सारी किताबें दिखा दीं। मैं खुश था; किताबें समेटने लगा और धन्यवाद बोलकर चलने लगा तो उन्होंने रोका। आँखों में हल्का लालच सा था। लगा कुछ पैसे माँगेंगे।
मैंने कहा, “जी भैया?”
बोले, “शनिवार को क्या कर रहे हो?”
मैंने कहा, “कुछ खास नहीं।”
फरमान आया “शनिवार को किताबें ले जाना।”
“शनिवार को क्यों?”
“तुमको मेरा एक काम करना होगा।”
“कैसा काम?”
“शनिवार को राजबन से बस आती है, उसमें सत्तू आ रहा है… सत्तू को धमकाना है।”
मेरी हवा खिसक गई। मैं मारपीट वाले गुट का कभी हिस्सा रहा नहीं था; इन पचड़ों से दूर रहना ही उसूल था। अब ये क्या बवाल?
“लेकिन भैया, मैंने आज तक किसी को पीटा नहीं।”
भैया मुस्कुराए “मुझे पता है, तुम पूरे पांवटा में फट्टू के नाम से मशहूर हो। तुमसे उम्मीद भी नहीं है। बस हमारे साथ चलना, पीछे खड़े रहना, हम सिर्फ धमकाएँगे।”
सिर्फ खड़ा रहना है, तो क्या खतरा? ऊपर से किताबें मिल रही थीं। शिक्षा के लिए परोपकार ज़रूरी है। मैंने हाँ कर दी। आगे की जानकारी सही समय पर देने की बात हुई।
सत्तू को मैं राजबन के दिनों से जानता था। दोस्ती नहीं थी, पर वह राजबन के लड़कों के दम पर सीना चौड़ा रखता था। हमारे ही स्कूल में था। अगले दिन स्कूल जाकर पता चला, शनिवार की प्लानिंग दोनों तरफ से जोर पर है। बिट्टू सरदार ने हमें बस अड्डे पर मिलने को कहा; उधर सत्तू भी अपने लड़के इकट्ठे कर रहा था। तय हुआ, शाम 6 बजे बस अड्डे पर धमकाना है।
मेरी सिटी-पिट्टी गुम थी। गुंडई की दुनिया में यह मेरा पहला कदम था। नहा-धोकर, सुंदर बाबू बनकर उतरना चाहता था। शाम 4 बजे से ही बाजार के चक्कर काटने लगा कि कहीं देर न हो जाए। दो-चार अंकलों ने घूरा भी, तिवारी जी का लड़का आज बड़ा उतावला लग रहा है।
ठीक 6 बजे मेरी साइकिल किसी ने रोकी।
“सुन, बिट्टू सरदार को बोल देना हॉस्पिटल की पिछली गली में मिलना है, वहीं हिसाब होगा।”
ओह, प्लान बदल गया था। देखा, पीछे सत्तू कुटिल मुस्कान लिए खड़ा था, जैसे आज सबके टुकड़े कर देगा। उसके पीछे मेरा दोस्त पंकज भी खड़ा था, शायद किताब लेने आया हो, क्योंकि वह शरीफ आदमी था। दो-चार और छोकरों के साथ मामला टक्कर का लग रहा था।
मैं दौड़कर बिट्टू को पकड़ने गया। वह अपनी राशन की दुकान पर पिताजी के सामने शरीफ बनने का नाटक कर रहा था। इशारा किया—बाहर आया और फटकारा, “यहाँ आने की क्या जरूरत थी?”
मैं बोला, “उस्ताद, बात ही ऐसी है…”
“उस्ताद?”
“छोड़ो… 5-6 लड़के हैं, करतारपुर से भी लाया है, और हॉस्पिटल के पीछे बुला रहा है।”
“तो मिल लेंगे। तू अभी से क्यों घूम रहा है?”
शायद मैं इसे प्रोजेक्ट बना चुका था। घर जाता तो घर वाले बिठा लेते। उन्हें क्या पता, अब मैं बिट्टू सरदार के गैंग का हिस्सा था, खास शार्प-शूटर जो खाली वक्त में खबरिया भी है। क्या मैं अपराध जगत में कदम रख चुका था? अपने आका के अगले आदेश का इंतजार कर रहा था।
समय से पहले मैं हॉस्पिटल की गली से दो गली पहले रुक गया। छिपकर देखना ही ठीक था, अकेले पकड़ लिया गया तो? हमारे शहर के गुंडों का उसूल था, जिस जगह, जिस वक्त बुलाया है, वहीं कूटा जाएगा; आगे-पीछे कूटना कायरों का काम।
थोड़ी देर में बिट्टू सरदार 8 लड़कों के साथ आता दिखा, हमारे ही स्कूल के थे। एक-दो भैया को नमस्ते की, पर उन्होंने नजरअंदाज किया। मैं नया खिलाड़ी था; नमस्ते-कैसे हो-खाना खाया जैसे शब्द इस लाइन में चलते न थे। मैं अभी भी संस्कारी गुंडा था।
हम पहुँचे। दो मिनट में सत्तू भी लड़के लेकर आ गया। दोनों गुट आमने-सामने। मैं पीछे खड़ा, कहीं पापा अपनी राजदूत पर निकल न जाएँ… निकलें तो 5 मिनट बाद।
बिट्टू और सत्तू आमने-सामने।
“बोल क्या बोल रहा था?”
“तू बोल क्या बोल रहा था?”
बस यही चर्चा चलती रही, कौन क्या बोल रहा था। कोई नतीजा नहीं। ये कैसी धमकी थी? सत्तू भी दब नहीं रहा था। तभी हमारे गुट के छोटू भैया ने खींचकर सत्तू के कान के नीचे एक झापड़ मारा। बस, फिर क्या था, हमारे लड़कों ने उनके लड़कों को तोड़ना शुरू कर दिया।
मैं हैरान, मुझे तो धमकी के लिए बुलाया गया था। यहाँ घूंसे चल रहे थे, दूसरे गट के लोग एक थप्पड़ में पस्त थे, माफियाँ माँग रहे थे, और बिट्टू सरदार भूखे शेर की तरह हर हड्डी पर वार कर रहा था।
मुझे कुछ न सूझा, बस निकलना ठीक था। पहले पंकज को साइड किया, हाथ जोड़कर कहा ये लोग पागल हो गए हैं, और पीछे की गली से भगा दिया। एक और लड़के को खींचकर निकलवाया। लगभग 2-3 लड़कों की जान बचाई। फिर साइकिल पर कूदा और घर भागा।
घर पहुँचा तो देखा, शिमला से पापा के दोस्त, बड़े पुलिस ओहदे पर, बैठे हैं। मुझे देखते ही पापा चिल्लाए,
“आ गया! चलो बेटा, अंकल को ‘कागज़ की कश्ती’ सुनाओ।”
मैं तुरंत तोते की तरह गाने लगा—
“ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो…”
..... जारी
- विवेक तिवारी

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