रेशेदार रिश्तेदार




हिंदुस्तान में हर परिवार में थोक के भाव रिश्तेदार   मिलते हैं. कानपूर के काका हों या बनारस कि बुआ, मुरादाबाद कि मौसी हों या मिर्जापुर कि मामी, सब फैले हुए हैं कोने कोने में. कुछ रिश्तेदार सिर्फ गाहे बगाहे शादियों में गोलगप्पे सुड़कते दिख जाते हैं. मसलन लंदन के लल्लन। ये लोग विदेसों से अपने बच्चे एयर इंडिया के इकॉनमी क्लास मैं वाया फ्लाइट पकड़ कर ओमान के रस्ते ५० घंटे में लंदन से लटकते भटकते पहुँचते हैं अपने बच्चों को "रीति रिवाज" का पाठ पढ़ाने। इस प्रजाति के बच्चे सिर्फ कोने में "वाओ" "वाओ" का जाप करते मिल जाते हैं.
रिश्तेदार अधिक्तर सभी के कोप भाजन  का शिकार बनते हैं. रिश्तेदार न हुआ खुनी दरिंदा हो गया, एक तरह से अपनी नाकामी का ढीकरा  रिश्तेदारों पर फोड़ने से भी लोग गुरेज़ नहीं करते। जैसे "अरे भाई साहब बस क्या बताऊ मेरठ में बीस  कट्ठे  कि जमीन खाली पड़ी है, बेच के आराम से चार ऑटो दौड़ा दूं दिल्ली में, लेकिन रिश्तेदार चील कि तरह आँख गड़ाए बैठे हैं, कि कब मैं जमीन का सौदा करू और वो चल दें उसमें अपना हिस्सा मांगने" जो सुन रहा होता है वो और आग में घी का काम  करता है, उसी में दो बात और जोड़ देता है "रिश्तेदार तो साले होते ही जन्मजात लालची हैं, कद्दू कटा नहीं कि चल दिए कटोरा लिए"
यूं पी के गोंडा जिले में निर्वाचन अधिकारी ननुआ मिसिर रिटायर होने के २ साल में मर गए, लोग  जमा हुए रोये गाये और पता चला ननुआ का सिर्फ एक  लड़का था. लड़कियां सब बियाह चुकी थी. अधिकारी जमा हुए तो काफी अफ़सोस में थे. ननुआ कि बीवी इस बात पर ज्यादा परेसान थी कि अकेला लड़का है, रिस्तेदार तो  नोच खायेंगे। रिश्तेदार न हुए डाकू दल हो गया कि असला बल्लम लिए घोड़े पर सवार सब लूट लेंगे।
यही कहानी पंजाब के टीटू कि थी. भाई कि शादी में वही हलवाई चाहिए था जिसने अभिषेक बच्चन कि शादी में छेना मुर्गी बनायीं थी. किसी रिश्तेदार ने आते जाते ताना मार दिया था कि टीटू के भाई कि शादी में तो हरचरण हलवाई के हाथ कि पूड़ी मिल जाए वही बहुत है. टीटू ने ठान लिया कि बस अब खाना बनेगा तो रामपुर के  गुड्डू हलवाई के हाथ, नहीं तो शादी गई तेल लेने।
रिश्तेदार हिंदुस्तान में एक अहम् किरदार होता  है. आपकी ज़िन्दगी का ताना बाना उसी के तानो से बनता बिगड़ता  है. लेकिन इसी रिश्तेदार को मजा चखाने के चक्कर में सभी भूल जाते हैं कि वो भी  रिश्तेदार ही हैं.

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