दकियानूसी ख्याल?

हेमंत ये जनता था की आने वाले ९ महीने उससे ज्यादा उसकी बीवी रश्मि पर भारी थे, उसे तो सिर्फ भाग दौड़ और भावनात्मक रूप से इस समय को निकलना था पर रश्मि के लिए तो शारीरिक रूप से भी ये किसी रण से कम नहीं था। खबर सुनते ही दोनों कीआँखें गीली हो गयी थी, हेमंत को नहीं पता था की वोह भी अन्दर से इतना अधीक इंतज़ार कर रहा था, उसे लगा ये क्षण शायद किसी और मूल्यवान क्षण की तरह ही होगा लेकिन ये सबसे अनमोल खबर थि. दोनों मां बाप बन्ने वाले थे. 
दोस्तों में खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गइ . सब शाम को मिलने पहुच गये. ग़ज़लों और शराब ने शाम का आनंद बढ़ा दिया . हेमंत और रश्मि दोस्तों में पहले पति पत्नी थे जिन्हें ये सुख मिलने वाला था। सभी उनसे सब कुछ जान लेना चाहते थे. कोई अपने बचपन की बात बताता था तो कोई नुस्खे बताता था, शाम गहरा गयी थी। अचानक सभी के लिए हेमंत और रश्मि सबसे प्रिय लगने लगे थे। दोनों के चेहरे पैर एक ग़जब का तेज था। किसी ने यूँ ही पूछ लिया, की लड़का चाहिए या लड़की? और हेमंत ने तपाक से कह दिया "लड़का". हेमंत का ये कहना था की अचानक हंसी ख़ुशी के माहौल में सन्नाटा छा गया। रूपा को तो जैसे किसी तत्तैया ने काट खाया हो. अचानक सबकी निगाह में हेमंत खलनायक, रेपिस्ट, क्रिमिनल, जड़ बुद्धि, दकियानूसी नजर आने लग. हेमंत ने पुछा "क्या हुआ?" . रूपा भड़क उठी "तुमको लड़की नहीं चाहिए?". हेमंत ने कहा "नहीं". रूपा एकदम गंभीर होगई "तुम ऐसे दकियानूसी ख्याल के निकोल्गे ऐसा मैंने नहीं सोचा था".  हेमंत को समझ नहीं आया "लेकिन इस बात का मेरे दकियानूसी होने से क्या सम्बन्ध?". रूपा ने अपना पक्ष रक्खा "हिंदुस्तान में लड़के की चाहत के लिए लोग क्या नहीं करते, तुम भी उन्हीं में से एक हो, जो पढ़ लिख कर भी उसी सोच के रहे की लड़का होगा तोह वंश चलेगा". विशाल ने बात बीच में सम्हाली और यूँ ही मजाक कर दिया "अगर चाहते भी हो की लड़का हो, तब भी लड़की ही बोलो सबके सामने नहीं तोह सब तुम्हें पिछड़ा सम्झेङ्गे." . हेमंत को ये बातें काफी बुरी लगीं। धीरे धीरे सब चले गए। हेमंत और रश्मि प्लेटें उठाते हुए रात को हुई बहस के बारे में ही सोच रहे थे। हेमंत ने पुछा "रश्मि अगर मुझे लड़का चाहिए तोह मैं पिछड़ा कैसे हो गया?" जवाब रश्मि के पास भी नहीं था, वो ख़ामोशी से सामान फ्रिज में दाल रही थी। हेमंत जैसे खुद से ही बातें किये जा रहा था "अभी भी हम लोग इसी बहस में लगे हुए हैं की लड़के के छह होना ग़लत है, ये मेरा हक है की मैं क्या चाहता हूँ, इसमें बुराई क्या है?. हो सकता है किसी को लड़की चाहिए, ये उसका हक है, इसमें पिछड़ेपन  की बात कहा से आगई?". 
रश्मि और हेमंत दोनों को पता था की हिंदुस्तान का पूरा समाज अभी भी उसी मोड़ पर है। और हम शायद उस दिन अपनी सोच को सफल मानेंगे जिस दिन  लोग हमें इस बात से परखना बंद कर देंगे की हमें लड़का चाहिए या लड़की। दोनों ये बात जानते थे लेकिन इस बात को सोचने के लिए भी शब्द नहीं थे. 

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