Gen- Z का खौफ

 कल एक ऑटोवाले से बहस हो गई। वो मर्गिल्ला-सा, टाइट जीन्स पहने, जुल्फ़ों का छज्जा बनाकर, गुटखा दाँतों में पीसता एक छुहारा-नुमा हड्डी का ढाँचा था। जिस जगह जाने के रोज़ 40 रुपये लगते हैं, वहाँ ये छिलका 150 माँग रहा था। मैंने आदतन पूछ लिया "क्यों भाई?"

उसने ऐसे घूरा जैसे मैंने किराया नहीं, उसके सजीव होने का सबूत माँग लिया हो। बोला, ”ए अंकल, शानपट्टी नक्को। जैन जी है मैं, जैन जी।"
उसके बैंगनी रंग वाले चेहरे में धँसी लाल आँखें बाहर गिरने को आतुर थीं। मुझे उस पर हँसी आ गई। मैंने पूछा, "वो क्या होता है?"
अब वह और उत्तेजित हो गया। "इष्टा ग्राम नहीं देखता क्या?"
वह शायद Gen-Z कहना चाह रहा था, मुझे डराने के चक्कर में उसका चेहरा और मनोरंजक होता जा रहा था। अभी पट्ठा ज़िंदगी के उस पड़ाव पर था जब उसे यह ज्ञान नहीं था कि जीवन के नृत्य में कौन सी मुद्रा कहाँ पेश करनी है। जहाँ असंयुक्त हस्त से काम चल जाता, वहाँ वह संयुक्त हस्त का इस्तेमाल कर रहा था। उससे बहस करना समय नष्ट करना था। पैसे देकर मैंने जान छुड़ाई। चलते-चलते मुझे अपना ही एक किस्सा याद आ गया।
हम भी ऐसे ही थे। बेकाबू.
1995 में हम दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से आईआईटी कानपुर गए थे, वहाँ के वार्षिक महोत्सव 'अंतराग्नि' में भाग लेने। पूरे देश से छात्र वहां महोत्सव में भाग लेने आते थे. चार दिन बड़े मज़े से कटे। पाँचवीं रात भारी पड़ गई।
वापसी से ठीक एक रात पहले हमारी हाथापाई कुछ छात्रों से हो गई। दो-तीन लड़कों को हमने कूट दिया। अब किस्मत इतनी ख़राब कि वे लड़के वहीं आईआईटी के ही निकले। मुद्दा कुछ नहीं था, उस उम्र में मुद्दे नहीं होते, बस मार-पीट हो जाती है।
दिल्ली होती तो इसे 'सीन' कहा जाता। कानपुर में, आईआईटी के भीतर, इसे भविष्य से खिलवाड़ कहा जाता है।
हमारा ठहरना भी आईआईटी के हॉस्टल में ही था। मतलब दुश्मन के इलाके में ही वास. सुबह की ट्रेन थी। यानी आज क्रांतिकारी बनना व्यावहारिक नहीं था।
रात एक बजे ख़बर आई, आईआईटी वाले कैंपस में बदला नहीं लेंगे। क्योंकि हमें भीतर निपटाना उनके लिए आगे भारी पड़ सकता था। आईआईटी के लड़कों का दिमाग़ कंप्यूटर से भी तेज़ चलता है, बहुत आगे की सोचते हैं। उनका निर्णय हुआ, हमें रेलवे स्टेशन पर कूटा जाएगा। यानी मामला अब संस्थागत नहीं, सार्वजनिक हो चुका था।
सुबह स्टेशन पहुँचे। ट्रेन लेट थी। दिल्ली में कोई रैली थी, और वह भी आज ही। इस दहशत भरे माहौल में हम उन मुर्गों की तरह बैठे थे, जो पिंजरे में बंद दुसरे मुर्गे को दुनिया से पलायन करते देखते रहते हैं। ऐसा लग रहा था जैसे किसी महोत्सव से नहीं, शोकसभा से लौट रहे हों। हमला कहीं से भी, कभी भी हो सकता था।
घंटों बाद जब हमारा ख़ून सूख चुका था, ट्रेन आई। खचाखच भरी हुई। रैली के लोग हमारी सीटों पर पहले से बैठकर क्रांति के छिलके यहाँ-वहाँ फैला चुके थे। जैसे उन्हें लोभ देकर ज़बरदस्ती आंदोलन करवाया जा रहा हो।
जैसे ही ट्रेन चली, डर उतरा। और जैसे ही डर उतरा, हम बहादुर हो गए। हमारे भीतर भी क्रांतिकारी फूट पड़ा। हम अचानक आंदोलनकारी बन गए। आख़िर रात के जागे, थके, डरे हुए लोग थे हम, और हमारी आरक्षित सीटों पर कब्ज़ा हो चुका था। हम दिल्ली से कानपूर प्रताड़ित होने तो आये नहीं थे। हम विपदा का सामना करने के बाद चैन से बैठना चाहते थे.
ट्रेन अब कानपुर से निकल चुकी थी। अब विद्रोह का स्थान उचित था। परिवर्तन के लिए भूगोल ज़रूरी होता है।
हमने तय किया, बिना टिकट यात्रा अपराध है। और अपराध का न्याय मौके पर होना चाहिए। बस फिर क्या था, लात-घूँसे, कमर-मद्दे, चटखनम मुख-भंजनम।
जिस ख़तरे से हम पूरी रात जूझते रहे थे, उसके टलते ही हमने सामने वाली पार्टी पर अपनी थकान उँड़ेल दी। दस मिनट में डिब्बा ख़ाली। टीटी आया, हालात देखे, और चुपचाप पान चबाता चला गया। वह अनुभवी व्यक्ति था।
एक बुज़ुर्ग बोले, "ये होती है युवा शक्ति।"
हमें तब नहीं पता था कि हम Generation-X हैं। हमें बस इतना पता था, डर उतर जाए तो आदमी क्रांतिकारी बन जाता है।
बाद में जाना, Silent Generation ने आज़ादी दिलाई, Baby Boomers ने चीन और पाकिस्तान से जंग लड़ी, हमने मंडल विद्रोह किया, Millennials ने भ्रष्टाचार पर आंदोलन किए, और अब Gen-Z.
दरअसल ये युवा शक्ति ही है। इस बार बस उसे नया नाम दे दिया गया है, और नाम चल पड़ा।
Gen-Z से सबको उम्मीदें हैं। Gen-Z ने हमें ये भी सिखाया कि पीढ़ियों के नाम भी होते हैं। उम्मीद होनी चाहिए, लेकिन बदलाव की। Gen-Z कोई माफ़िया नहीं है कि नाम लेते ही आँखें दिखाई जाएँ। न ही कोई कुख्यात उपद्रवी। सदियों से युवा क्रांतिकारी रहा है, और आगे भी रहेगा।
कल ही एक लड़का मिला, मूंछ अभी उगी नहीं थी। कुछ चबाता मुझे घूर के देख रहा था, निक्कर थोड़ी नीचे लटकी हुई। चड्डी पर लिखा था, ”Gen Alpha"। सुना है पिछले साल “Gen Beta” भी जन्म ले चुका है।
क्रांति की उम्मीद चलती रहेगी। नाम बदलते रहेंगे। और हर पीढ़ी यही कहेगी “अबकी बार, आर या पार।"
युवा शक्ति ज़िंदाबाद।
- विवेक तिवारी

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