नाम में क्या रखा है?

शेक्सपियर के नाटक Romeo & Juliet में Juliet ने कहानाम में क्या रखा है।गुलज़ार ने पकड़ लिया  नाम गुम जाएगा।”. कवियों का तो कमाल है, दो पंक्तियों में पूरी जिंदगी कह जाते हैं। हम जैसे लोगों को वही समझने में जिंदगी लग जाती है।खैर, बचपन में सुनी बात काफी देर में समझ आई कि "आख़िर नाम में रखा क्या है?"

मैं आज़मगढ़ के एक बहुत छोटे से गाँव में पैदा हुआ जहाँ उस ज़माने में लोगों के नाम "कालू", "रामू", "बुद्धन", "बुधिया" जैसे हुआ करते थे। थोड़े पढ़े-लिखे परिवार में नाम "राम पलट", "राम खिलावन", "नवरतन दास" हुआ करते थे। मैं थोड़ा संभले हुए परिवार में पैदा हुआ, पिता जी उन दिनों BHU में पढ़ रहे थे, माँ ने स्नेह में डूबकर रखागुड्डू।

नाम ऐसा कि सुनते ही लगता है, जैसे किसी ने गरम रोटी पर घी लगा के बच्चे को पुकारा हो — “आजा गुड्डू, खा ले।फिर पिता जी गए। अब मुझे ऐसा अंदाज़ा है कि शहर में पढ़ाई कर रहे एक नौजवान को अगर पता चले कि उसका नाम "गुड्डू" हुआ है, तो वह बिल्कुल उत्साहित नहीं होगा। और नाम एकदम शायराना नहीं था। अब सोचो अगर बेटा बड़ा होकर पायलट बन जाए और केबिन में आवाज़ आए "हैलो, दिस इज़ योर कैप्टन गुड्डू स्पीकिंग", डॉक्टर गुड्डू अच्छा लगता है, ब्रिगेडियर गुड्डू। गुड्डू नाम तो सटीक बैठता है "डाकू गुड्डू सिंह", "गुड्डू झपटमार". ना, मैं ऐसा नहीं होने दूंगा।


पिता जी को मौका (उस ज़माने में अपनी पत्नी से मिलना मौका ही मन जाता था) मिला तो माँ को थोड़ा समझाने की कोशिश की, "देखो मेरा मानना है नाम बहुत सुंदर है लेकिन इस नाम से उसके आगे के रास्ते थोड़े संकीर्ण हो जाते हैं, प्रोफेशन लिमिटेड हो जाता है। इसका नाम होगा विवेक तिवारी" ये नाम माता जी को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा, माँ बोलीं, “बिलकुल बासी नाम है, सुनते ही नींद रही है।  ऐसा लगता है जैसे रोडवेज की बस में कोई आम आदमी सर पर बैग लिए लटक के कहीं जा रहा है, ऐसा नहीं लग रहा है कि बुलेट पर सवार, चश्मा पहने, लाल गमछा लपेटे कोई पान चबाता रहा है।काफी बहस हुई और आख़िर में ये तय हुआ कि घर में तुम गुड्डू बुलाओ, बाहर कागज में नाम विवेक तिवारी रहेगा।

बड़ा हुआ, स्कूल गया। मास्टर जी बोले — “नाम बताओ।मैं बोला  विवेक तिवारी।क्लास के पीछे से आवाज़ आई — “अरे ये गुड्डू है!”, यानी पहचान गुमनाम नहीं होती, गुड्डू हर बार पहचान चुरा लाता था। मुझे अच्छा भी लगता था, अपनत्व-सा लगता था। गुड्डू में माँ की ममता थी, विवेक में पिता जी का कठोर पक्ष, लेकिन मैं दोनों नाम से जाना जाने लगा।

मुझे अपना नाम काफी पसंद था, क्योंकि अलग था। अमित, जगदीश, सुरेश, कमलेश तो बहुत थे पर विवेक तिवारी किसी और का नाम नहीं था।

एक दिन एक अंकल घर पर आए, पिता जी के काफी करीबी थे। पता चला किसी काम से पाँवटा अस्पताल जा रहे हैं, मुझे अपना दाँत दिखाना था। पिता जी ने उन्हीं के साथ मुझे भेज दिया। वहाँ जाकर डॉक्टर ने पूछा "तुम्हारा नाम क्या है?" तो मेरे बोलने से पहले अंकल चिल्लाए "इनका 'सिर्फ' नाम विवेक है!", और दोनों ठठा मार के हँसे। मुझे समझ नहीं आया कि इसमें हँसने वाली क्या बात थी भाई। बहुत साल बाद मैं समझा और अंकल के चुटकुले का मतलब।

खैर, अब धीरे-धीरे गुड्डू कहीं खो गया और विवेक नाम ज़्यादा बोला जाने लगा। दिल्ली में सभी दोस्त मुझे या तो "विवेक" या "तिवारी" के नाम से बुलाते थे, "गुड्डू" बहुत खास ही लोग बुलाते थे।

मुझे हमेशा लगता था कि "विवेक तिवारी" नाम का एक मैं ही प्राणी हूँ जिसने धरती पर जन्म लिया है।

और मेरा नौकरी की तरफ पहला कदम पड़ा जब मैं 19 साल की उम्र में एक इंटरव्यू देने पहुँचा। मुझे याद है इंडियन हैबिटेट सेंटर, दिल्ली का खचाखच भरा एक हॉल जहाँ लगभग 100 लोग इंटरव्यू के लिए आए थे। एकदम मशीन की तरह इंटरव्यू लिए जा रहे थे। एक साथ 10-10 लोगों के अलग-अलग टेबल पर। मेरा भी नंबर आया। और बाद में उसी हॉल में उन नामों की घोषणा हो रही थी जो सेलेक्ट हुए हैं। नाम पुकारे जा रहे थे, और लोग खड़े होकर इस बात की सूचना दे रहे थे कि अमुक व्यक्ति वह हैं। तभी नाम पुकारा गया "विवेक तिवारी" मैं खुशी से खड़ा हुआ, पीछे देखा तो एक और खड़ा है। उस हॉल में विवेक तिवारी नाम के तीन लोग खड़े थे। मेरे लिए वह पहला झटका था। वो दिन था जब समझ आयामैं उतनायूनिकनहीं जितना अपने नाम से उम्मीद की थी।

काफी साल बाद बंबई गए, गुड्डू तो एकदम ही पीछे छूट गया। और ये भी एहसास हुआ कि गुड्डू दरअसल "पप्पू", “छोटू", "बिट्टू" टाइप नाम ही है, गुड्डू सुनते ही लगता है कि पिछली गली से आया बच्चा अभी पैंट संभालते हुए भागा है। इसलिए बताना ही बेहतर है।

2004 की बात है। मैं फिल्म शब्द कर रहा थाऐश्वर्या राय लीड में थीं, और हमें 40 दिन गोवा में शूट करना था। उस वक्त उनकी शादी नहीं हुई थी, और उनकेकरीबी दोस्तविवेक ओबेरॉय सुर्खियों में थे।

मेरा काम थाऐक्टरों के साथ डायलॉग की तैयारी। गोवा पहुँचे, शूट शुरू हुआ। डायरेक्टर मुस्कराए, बोले, “ऐश्वर्या तो तुम्हारा नाम सुनकर खुश हो जाएंगी।
पहली बार लगानाम भी कभी फायदेमंद हो सकता है। मन में ख्याल दौड़ाविवेक तिवारीविवेक ओबेरॉय शायद नाम सुनते ही ऐश्वर्या मुस्कुरा उठें, सोचे — “कितना सज्जन नाम है।और क्या पता चालीस दिन में दोस्ती भी हो जाए।

पहले दिन मुझे ऐश्वर्या की वैनिटी में बुलाया गया। मैं स्क्रिप्ट समझाने लगा। वो बहुत प्रोफेशनल थींध्यान से सुनतीं, हँसतीं, जवाब देतीं। आधा घंटा काम और बातेंमाहौल हल्का, दोस्ताना।
मैं उठने ही वाला था कि उन्होंने पूछा — “तुम्हारा नाम क्या है?”

बस, वही पल थाजहाँ पेशेवर रिश्ता शायद दोस्ती में बदल सकता था। मैंने मुस्कुराकर कहा — “विवेक।

और जैसे किसी फिल्म में सीन पलट जाता हैउनका चेहरा मुस्कान से सख्ती में बदल गया। आँखों में अचानक ठंडक उतर आई। ऐसा लगा मानो उन्होंने सुना नहीं, झेला हो।

मैं चाहता था कि फौरन सुधार दूँ — “गुड्डू हूँ मैं, गुड्डू तिवारी, गुड्डू सिपाही…” पर देर हो चुकी थी। 

उसके बाद सब बदल गया। ऐश्वर्या जो बाकी सबके साथ खिलखिलाती थीं, मुझे देखकर पुराने ज़माने की मनोरमा बन जातीं।मुझे डर था कि कहीं अकेला पा कर मेरे सीने में वो खंजर ही ना भोंक दें. तब पहली बार समझ आयानाम में वाकई बहुत कुछ रखा है और ये भी की भैया विवेक ओबेरॉय आपके भी अच्छे दिन नहीं आने वाले हैं। 

खैर, मुझे लंबा लेख लिखने पर मजबूर किसी एक वाकये ने नहीं किया। इस घटना को मैं सदियों से देख रहा हूँ, और मेरे लिए यह काफी मनोरंजक है सोचा आप लोगों का भी मनोरंजन हो जाएगा। दरअसल मेरे विवेक तिवारी होने और दुनिया में हर दूसरे आदमी का नाम मुझसे मिलता-जुलता होने में मुझे कोई आपत्ति है, फर्क पड़ता है, लेकिन मामला बदला गूगल आने के बाद।

जब ईमेल बनने शुरू हुए। शायद मैं उन विवेक तिवारी लोगों में पहला आदमी था जिसने तुरंत विवेक तिवारी के नाम से हर जगह ईमेल आईडी खुलवा दिए, उस वक्त उपलब्ध था। जब तक बाकी विवेक तिवारियों की तंत्र-टूटी तब तक मैं बाजी मार चुका था। जीवन में कुछ चीजें मैंने भी पाई हैं जिनमें से एक यह है।

अब जैसे-जैसे Gmail और Yahoo बढ़ने लगे दूसरे विवेक तिवारियों ने भी अपने अकाउंट खोलने शुरू किए। लेकिन अफसोस कि उनको सीधा विवेक तिवारी नाम की आईडी नहीं मिल पाई। लेकिन अब पिछले 3-4 सालों से एक नई घटना देखने को मिली। मुझे कई ऐसे ईमेल आने लगे जो मेरे नाम से थे लेकिन मेरे नहीं थे। यानी किसी और विवेक तिवारी के नाम के भेजे गए ईमेल मुझे मिलने लगे। लेकिन ऐसा क्यों हो रहा था?

अब इसके कई कारण हो सकते हैं। गूगल का कोई बग है जिसमें वह विवेक तिवारी नाम के मेल भेजता है, शायद वह मुझे ही इस नाम का असली हकदार मानता हो। मुझे e-mail आया कि आपने जो "गिटार" खरीदा था उसका इनवॉइस यह रहा। उसमें मेरा नाम विवेक तिवारी लिखा होता है और एड्रेस "अमेरिका" का। फिर एक ईमेल आया कि "आपकी स्कूटी का इंश्योरेंस हो चुका है ये रही इंश्योरेंस कॉपी" अब इसमें एड्रेस रुड़की का था।अब कोई विवेक तिवारी है बैंगलोर में, उसकी बैंक स्टेटमेंट मुझे आती है। उसकी बैंक अकाउंट की स्थिति मुझसे भी खराब है। ऐसे 10-15 विवेक तिवारियों के कच्चे चिट्ठे मेरे पास खुलते हैं। एक विवेक तिवारी कलकत्ता में पाया गया जिसका एयरटेल का बिल हर महीने आता है। उस एयरटेल बिल के नंबर पर मैंने कॉल किया, किसी ने उठाया मैंने कहा "जी मैं विवेक तिवारी बोल रहा हूँ" तो बोला "हाँ बोल रहा हूँ" मैंने कहा "जी मैं भी विवेक तिवारी बोल रहा हूँ" उसने "बोका#$%^" बोल के फोन ही काट दिया। उसने मुझे मौका ही नहीं दिया बात बताने का। अब मैं समझ गया कि किसी को कुछ बोलने का फायदा नहीं है, जो हो रहा है उसका मजा लो।

सबसे मजेदार गाजियाबाद वाला विवेक तिवारी है। अब क्यों ये तो वही बता सकता है लेकिन उसने अपनी गाड़ी के फास्टैग में मेरी ईमेल आईडी दी हुई है। अब वह जितनी बार फास्टैग रिचार्ज कराता है मुझे मेल आता है। वह जितनी बार टोल नाका क्रॉस करता है मुझे मेल आता है। वह हर हफ्ते गाजियाबाद से Car में गाजियाबाद से छजरासी टोल प्लाजा, वहाँ से ब्रजघाट और फिर कोयला होते हुए कहीं तो जाता है। लेकिन वह पहले रिचार्ज करवाता है और HDFC फास्टैग मुझे मेल भेजता है। कभी सफ़र में टाइम पास के लिए सोचता हूँआज गाजियाबाद वाला विवेक तिवारी कोयला पहुँचा या नहीं। दिमाग में कभी-कभी टेंशन भी रहती है अगर वह किसी ढाबे पर रुक जाए कि कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गई? अब आप सोचिए कि अगर आपको हर हफ्ते एक मेल आए कि गाड़ी गाजियाबाद से निकल चुकी है और तब तक मेल आते रहे कि अब गाड़ी कोयला क्रॉस कर चुकी है। और यह कार्य पिछले 3 साल से हर हफ्ते हो रहा है। और एक दिन मेल आए कि गाड़ी गाजियाबाद से निकल गई है लेकिन कोयला वाला मेल ही ना आए दो दिन तक तो आप क्या करेंगे? भगवान करे ऐसा हो।अब देखिए, तकनीक के ज़माने में मैं एक अनजान आदमी के सफ़र की चिंता कर रहा हूँसिर्फ इसलिए कि हमारा नाम एक है।

लेकिन ये मेल बंद कराने के लिए मैंने HDFC को मेल कर चुका हूँ, उस आदमी को ढूंढ चुका हूँ लेकिन कुछ भी नहीं हुआ है। मैंने इसे अपनी नियति मान ली है।

ऐसे 10-12 और छोटे-मोटे विवेक तिवारी हैं जिनके किस्से हफ्ते-दो हफ्ते में मेरे पास आते हैं। एक बड़े ही खास दोस्त ने मेरा फोन ही एक दिन काट दिया, उठाया नहीं। मैंने मैसेज किया तो उसका फोन ही गया "अरे यार सॉरी, मुझे लगा वो दूसरा वाला विवेक तिवारी है, बड़ा चेपू है" मुझे बाद में एहसास हुआ कि कहीं वह मुझे ही तो हिंट नहीं दे गया?

खैर, मुद्दे वहीं हैं - नाम में क्या रखा है? लेकिन क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है? ज़रूर बताइयेगा। और ये दिवाली अपने परिवार के साथ धूम-धाम से मनाइयेगा।

मेरी यही कामना है कि आपका "नाम" इतना बड़ा हो कि जैसे अमिताभ बच्चन नाम के कई लोग होंगे लेकिन यह नाम सुनते ही सिर्फ एक ही शख्स दिमाग में आता है, वैसे ही आपका नाम सुन के सिर्फ आप ही सबको याद रहे।

बाकी नाम में क्या रखा हैबस उतना जितना कोई भूल पाए।


हैप्पी दिवाली।

  • विवेक तिवारी "गुड्डू"

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