रैली का शोर और फिर हमेशा के लिए सन्नाटा

 




आज यूँ ही किसी बात पर एक किस्सा याद गया ड्राइविंग का शौक मुझे बचपन से था और कोशिश करता था कि बड़ों की नज़रों से बचकर खुद ही गाड़ी चला दूँ। हालांकि उस वक्त मेरी उम्र बारह-तेरह साल रही होगी, लेकिन पता नहीं क्यों, मुझे लगता था कि मैं ड्राइविंग सीट पर बैठकर बिना सीखे ही गाड़ी चला लूंगा। और एक दिन लड़कपन में मैंने वही कर भी दिया। किसी को आसपास देखकर मैंने गाड़ी की चाबी ली और धीरे से गाड़ी आगे बढ़ाई और मोड़ दी। हालांकि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था और ही मैं यह सलाह किसी को दूंगा, लेकिन मेरा आत्मविश्वास तो बढ़ ही गया था। मुझे कभी गाड़ी चलाना सीखना नहीं पड़ा, जैसा कि ज़्यादातर छोटे शहरों में लड़कों के साथ होता है। उनको मोटर साइकिल और गाड़ी चलाना कभी सीखना नहीं पड़ता, वे अभिमन्यु की तरह सब पहले से सीखकर ही जन्म लेते हैं। लेकिन मेरा शहर थोड़ा और ख़ास था। यह गाड़ी चलाने का कीड़ा मुझमें जापान, केन्या, यूरोप, अमेरिका के नामी रैली ड्राइवर्स से आया था, जो मेरे शहर पांवटा साहिब हर साल आते थे।


यह बात 80 के दशक की है, जब हिंदुस्तान में "हिमालयन कार रैली" की शुरुआत हुई थी। यह रैली हिमाचल प्रदेश में मेरे शहर पांवटा साहिब से होकर जाती थी। जो पुराने लोग हैं, वे जानते होंगे कि यह हमारे लिए कितना बड़ा इवेंट था। "हिमालयन कार रैली" की यादें ऐसी चिपक के बैठीं कि लगता है अभी खिड़की के बाहर बिना साइलेंसर की गाड़ी की आवाज़ जाएगी। उफ्फ! उस ज़माने के हिसाब से ऐसी कमाल की गाड़ियाँ देखने को मिलती थीं, जो भारत की सड़कों पर आम नहीं थीं। बाहर से आई इन गाड़ियों को देखकर मज़ा जाता था। और गाड़ियों पर तरह-तरह के स्टीकर्स, लाइटें, और आवाज़ें पूरा माहौल जादुई कर देती थीं। ऐसा नज़ारा देखने के लिए पूरा साल इंतज़ार करना पड़ता था।



यह रैली छह से सात दिन चलती थी, ख़ास बात यह थी कि शाम को दिल्ली से चलने वाली यह रैली सुबह-सुबह पांवटा पहुँचती थी और वहां बवेजा अंकल के पेट्रोल पंप पर रुकती थी। इंडियन ऑयल का यह पंप गाड़ियों की refuelling करता था, और ज़्यादातर रैली ड्राइवर वहाँ नाश्ता-पानी करते थे और टायर भी बदलते थे। एक कार पंद्रह मिनट से आधा घंटा रुक जाती थी, और वहाँ रैली ड्राइवर्स का मेला-सा लग जाता था। बवेजा अंकल हमारे घनिष्ठ पारिवारिक मित्र थे, तो सुबह-सुबह मैं और मेरा बचपन का दोस्त मयंक प्रताप सिंह ठाकुर वहाँ पहुँच जाते थे और इस अद्भुत माहौल का आनंद लेते थे।


वह दृश्य मुझे आज भी याद है, जब उजाले में भी रैली की गाड़ी अपनी सारी लाइटें जलाकर बहुत तेज़ आवाज़ करती हुई पहुँचती थी। इन गाड़ियों में साइलेंसर होने की वजह से आवाज़ इतनी ज़ोर से होती थी कि माहौल एकदम बदल जाता था। सभी गाड़ियों में अलग-अलग ब्रांड के रंग-बिरंगे स्टीकर्स, उनका एक अलग नंबर, ड्राइवर का नाम सब करीने से लिखा होता था, यहाँ तक कि ड्राइवर का ब्लड ग्रुप भी बोनट के पास लिखा होता था। नेविगेटर यानी सह-ड्राइवर का नाम भी साथ में होता था। गाड़ी के अंदर झाँकने पर वह किसी एयरक्राफ्ट के कॉकपिट से कम नहीं लगती थी। Mitsubishi Starion, माज़दा, Toyota Celica, ऑडी, Nissan 200SX, Lada Riva के साथ-साथ अपनी मारुति जिप्सी और जोंगा भी प्रतियोगिता में थीं। इन गाड़ियों को देखकर ऐसा लगता था जैसे हम किसी और दुनिया में हैं। हर तरफ मैकेनिक, ड्राइवर्स, भीड़, कैमरामैन, फोटोग्राफर्स। उस ज़माने में कैमरा सिर्फ अंग्रेज़ों के हाथों में होता था. 


रैली की दुनिया के दिग्गज जिनमे जापान के केनज़ेरो शिनज़ुका, केन्या के जयंत शाह और अपने भारत के निखिल तनेजा जैसे बड़े नाम शिरकत करते थेनिखिल तनेजा भारत के प्रमुख रैली ड्राइवर थे और लोगों की उनसे बहुत उम्मीदें थीं। तनेजा साहब से मिलना अपने आप में बहुत प्रोत्साहन देता था। लेकिन इन सब में सबसे खास नाम था कर्नल कुलबीर सिंह चौहान का, जो हमारे ही सिरमौर के शहर नाहन के रहने वाले थे। कर्नल साहब को हम प्यार से "मट्टू अंकल" कहते थे। मेरा मित्र मयंक मूलतः नाहन से ही था इसलिए उसके सम्बन्ध कर्नल साहब से पारिवारिक थे, मैं बस यूँ ही अपनी मूंछ पर ताव देने के लिए धीरे से उनको "मट्टू अंकल" से सम्बोधित करने की नाकाम कोशिश करता था.  अपनी जिप्सी में जब वह पहुँचते थे, तो शहर में लोगों के चेहरे खिल उठते थे। उनके काफी रिश्तेदार पांवटा में भी रहते थे, जो उनसे मिलने आते थे।

एक बार उनके परिवार से एक बुजुर्गवार उनसे मिलने आए, उनकी आँखें नम थी  "मट्टू अंकल" का चेहरा हाथ में पकड़कर रुंधे स्वर में बोले, "क्यों करता है ये, आराम से चलाया कर।" मट्टू अंकल सिर्फ मुस्कुरा दिए। वह दृश्य मुझे बहुत मार्मिक लगा और एहसास हुआ कि यह काम कितना कठिन और खतरनाक हो सकता है। गाड़ी को और ड्राइवर को कभी भी कुछ भी हो सकता है, लेकिन डर से तो दुनिया चलती नहीं।

यह सिलसिला लगभग दोपहर तक चलता रहता था। गाड़ियाँ आती रहती थीं, और फिर आगे सतौन से होते हुए रेणुका जी निकल जाती थीं। इन गाड़ियों के जाते ही एक सन्नाटा सा हो जाता था, जैसे तूफान के बाद का सन्नाटा। और फिर कभी-कभी कोई गाड़ी फटफटाती हुई पहुँच जाती थी जिसे देखकर हम हँसते थे। अब या तो वह बिचारा एकदम स्लो ड्राइवर था या रास्ता भटककर देर से पहुँचा था, लेकिन वह परिहास का विषय तो बन ही जाता था।

हमारे लिए तीन पॉइंट थे जहाँ से हम हिमालयन रैली का मज़ा लेते थेपांवटा में बवेजा अंकल का पेट्रोल पंप, राजबन जहाँ गाड़ियाँ टाइम नोट करने के लिए रुकती थीं, हालाँकि यह समय बहुत कम था, और फिर सतौन। सतौन से रेणुका जाते वक्त ड्राइवर्स की असली परीक्षा शुरू होती थी। ये रोड बहुत खराब थी, एक तरफ पहाड़ था जहाँ से मलबा गिरता रहता था और दूसरी तरफ गहरी खाई जो सीधा नीचे नदी तक जाती थी। कहते हैं कि हिमालयन कार रैली के सबसे खतरनाक रूट में यह पैच भी शामिल था। वहाँ से गाड़ियाँ दूर चाँदनी तक दिखाई पड़ती थीं, धूल उड़ाती हुईं। घाटियों में गाड़ियों की आवाज़ तेज़ी से गूंजती थी। 


इसके बाद रैली में क्या होता था, इसके लिए हमें रात को साढ़े आठ बजे दूरदर्शन पर खबरों का इंतज़ार करना पड़ता था। लगभग 2-4 मिनट की खबर रैली पर दिखा दी जाती थी, और उतना ही हमारे लिए काफी था। वीडियो में हम इस बात का आनंद लेते थे कि जितने ड्राइवर दिख रहे हैं, उनमें से ज्यादातर ने सुबह ही हमसे मिलकर हमें बाय कहा था। वही टी-शर्ट पहनी है, वही चश्मा लगाया है। शिमला में रैली के लोग रात को "हॉलिडे होम" में रुका करते थे। शिमला से किसी को ट्रंक कॉल लगाकर पिताजी पूछ भी लिया करते थे कि रैली में सब ठीक चल रहा है कि नहीं। हालाँकि हम लोग रैली के सुचारू रूप से चलने में कोई योगदान नहीं कर सकते थे, लेकिन छोटे शहर में खबरें जान लेना भी एक बड़ा काम होता है। सभी पर जिम्मेदारी होती है, किसी भी बड़े इवेंट की, जिसमें दरअसल किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। 


जब रैली वापस आती थी, तब वह पांवटा में रुकती नहीं थी और सीधे देहरादून की ओर निकल जाती थी, जहाँ से वह रानीखेत, नैनीताल होते हुए दिल्ली जाने वाली होती थी। ये गाड़ियाँ एकदम सुबह निकलती थीं और ज़्यादातर लोग सो रहे होते थे, लेकिन हम निशाचर कहाँ सोने वाले थे। हमारे घर के पीछे से देहरादून की शिवालिक पर्वत श्रृंखला दिखती थी, जहाँ से यमुना के किनारे होते हुए रोड देहरादून को जाती थी। हम वहीं बैठे गाड़ियों की लाइटें देख कर खुश हो जाते थे, और उनकी आवाज़ से माहौल और भी मज़ेदार बन जाता था। 


और एक दिन हमारी खुशी का ठिकाना रहा। हम पीछे बैठे गाड़ियों को जाते देख रहे थे और तभी घर के सामने से गाड़ी की आवाज़ आई। ये कैसे हो सकता था? क्योंकि रास्ता तो हमारे घर से एक किलोमीटर दूर से जाता था। हम भागे और पता किया कि ये कौन सी गाड़ी है? हम लोग देवीनगर में रहते थे और देहरादून का रास्ता दूसरी तरफ से है, लेकिन काफी साल पहले देहरादून का रास्ता देवी नगर से होकर ही जाता था। रैली का ड्राइवर रास्ता भटक गया था। अब हम खड़े रहे कि वापस तो आएगा, क्योंकि आगे रास्ता बंद था। हलहलाता हुआ वह वापस आया और हमें देखकर रुक गया, "देहरादून?" उसने पूछा। "आगे से left," हमने जवाब दिया। उसने हमारा धन्यवाद किया लेकिन हमने फिर पूछा, "नाश्ता कर लो?" उसने ना में सिर हिलाया, मुस्कुराया और भनभनाता हुआ चला गया। "एक सैंडविच तो खा जाता, हमें भी कहने को हो जाता।" लेकिन वह हमारे लिए सबसे खुशी का पल था, जब सुबह-सुबह एक सुनसान सड़क पर सिर्फ हम और एक रैली ड्राइवर थे और उसने हमसे बात की। अब हम आराम से सो सकते थे। हमने उस गाड़ी का कंपेटिटर नंबर भी नोट कर लिया। 


कुछ दिन बाद रैली दिल्ली पहुँची और शाम को वही साढ़े आठ बजे की खबर में पता लगने वाला था कि कौन जीता। हमारा भटका हुआ ड्राइवर शायद आखिरी कुछ लोगों में शुमार था, जीत जाता तो ज़्यादा खुशी होती, लेकिन वह तो नहीं जीत पाया। जीते तो वही तुर्रमखां नंबर एक केजेरो शिनज़ुका, और जयंत शाह तीसरे नंबर पर। निखिल तनेजा शायद पांचवें नंबर पर आए, लेकिन खुशी की बात यह थी कि उस रैली में भारत के नंबर एक ड्राइवर वही थे। 


मैं और मेरे दोस्त मयंक ने मन बना लिया था कि अठारह के होते ही हम भी हिमालयन कार रैली में जाएँगे। हमने यह भी पता कर लिया था कि कितने पैसे लगते हैं और नियम क्या हैं। हमने तैयारी शुरू कर दी थी। अक्सर हम सतौन से रेणुका अपनी लाल जिप्सी में निकल जाया करते थे और समय नोट करते थे। हमें मालूम था, सबसे खतरनाक पैच यही है। कभी गाड़ी फिसलती, कभी उछलती, लेकिन हम बिना डरे धूल उड़ाते चलते रहते। हमने अपने नेविगेटर भी तय कर लिए थे। हमारे हिसाब से वह एक इंजन का मैकेनिक होना चाहिए, ताकि इंजन में कोई प्रॉब्लम हो तो वह संभाल ले, थोड़ा पढ़ा लिखा हो, बाकी तो हम संभाल ही लेंगे। हमने कहना भी शुरू कर दिया था कि हम तो रैली ड्राइवर हैं। 


लेकिन भारत में कोई भी अच्छी चीज़ जैसे ही लोगों को खटकने लगती है, उसके खिलाफ आवाज़ें उठने लगती हैं। और जहाँ राजनीति घुस जाए, वहाँ तो बेड़ा गर्क होना स्वाभाविक ही है। हिमालयन रैली के साथ भी धीरे-धीरे यही हुआ। रैली दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल, उत्तर प्रदेश (तब उत्तराखंड नहीं था) होते हुए निकलती थी। वहाँ के स्थानीय राजनेताओं को मुद्दा मिल गया। उन्होंने यह तमाशा बंद करने के लिए आंदोलन शुरू कर दिए। रैली को कहीं-कहीं रोका जाने लगा। एक स्वीडिश ड्राइवर तेज़ रफ्तार की वजह से मारा गया। कुछ एक्सीडेंट भी हो गए। और लोगों को आवाज़ से दिक्कत होने लगी कि यह तो प्रदूषण फैला रहे हैं, हर बात मुद्दा बनने लगी। 1990 हिमालयन रैली का आखिरी साल था, और तंग आकर यह रैली बंद हो गई। 


रैली बंद होने पर लोगों ने आतिशबाजी की, पटाखे भी चलाए होंगे। हमारे सपने ज़रूर टूट गए। मेरे जैसे कई लोगों के सपने टूटे होंगे। मुझे नहीं पता कि सिरमौर के बच्चों को कर्नल कुलबीर सिंह चौहान के बारे में कितना पढ़ाया या बताया गया होगा, लेकिन जैसे उन्होंने नाम रोशन किया था, ज़रूर उनके बारे में बताया ही गया होगा और उनसे लोग मिले भी होंगे उनके संस्मरण एकत्र करने के लिए। ऐसी मेरी धारणा है। 


मैं बड़ा हुआ तो मेरी ड्राइविंग रिश्तेदारों को रेलवे स्टेशन या किसी को बस स्टेशन से वापस लाने, बुआजी को किटी पार्टी में छोड़ आने तक सीमित रह गई। लेकिन मेरे दोस्त मयंक प्रताप सिंह ठाकुर ने जितना हो सका, इस जुनून को बरकरार रखा और जीप को मॉडिफाई करवा कर कुछ रैलियों का हिस्सा भी बना। मयंक का ड्राइविंग का जुनून आज भी ज़िंदा है, और जब भी मौका मिलता है, वह उसे पूरा कर लेता है। 


हिमालयन रैली के 1990 में पांवटा साहब से गुजरने के बाद का सन्नाटा आज तक पसरा है.  भारत में कई रैलियाँ अभी भी होती हैं और अच्छे स्तर पर होती हैं, लेकिन हमारे देश की सबसे प्यारी रैली कब की बंद हो गई, और कोई उसके पुनर्जीवन की बात नहीं करता।



हिमालयन कार रैली से जुड़े आपके भी कुछ संस्मरण हों तो ज़रूर साझा करें


कुछ वीडियो और फोटोज यहाँ शेयर कर रहा हूँ जो मैंने विभिन्न वेब्सीटेस से एकत्रित की हैं.   


-विवेक तिवारी 



हिमालयन रैली से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य 


"हिमालयन कार रैली" की शुरुआत 1980 में देश के प्रख्यात रैली ड्राइवर नज़ीर होसैन ने की थी। होसैन साहब खुद एक बेहतरीन ड्राइवर थे और चाहते थे कि भारत में भी अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं हों। इसी उद्देश्य से उन्होंने "हिमालयन रैली एसोसिएशन" की शुरुआत की, जिसके तहत यह रैली शुरू हुई। शुरुआती दो साल यह रैली बंबई से शुरू होती थी और हिमाचल के नारकंडा तक जाती थी। लगभग साढ़े पाँच हज़ार किलोमीटर का सफर तय करते हुए यह रैली सात दिन तक चलती थी। दो साल बाद मुंबई से दिल्ली का रूट हटा दिया गया और अगले आठ साल यह दिल्ली से नारकंडा और वापस दिल्ली का सफर तय करने लगी। मुंबई-दिल्ली का रूट हटने से काफी रैली ड्राइवर खुश थे, क्योंकि 'हिमालयन कार रैली' में यह रूट काफी समय बर्बाद करता था और इसकी कोई ख़ास ज़रूरत थी भी नहीं।


यह रैली छह से सात दिन चलती थी, और रूट रहता था दिल्ली-मोरादाबाद होते हुए रानीखेत, नैनीताल का सफर तय करके हिमाचल के पांवटा साहिब, रेणुका होते हुए शिमला जाती थी, और नारकंडा से वापस दिल्ली की ओर चलती थी। जहाँ तक मुझे याद है, शायद 1987 के आस-पास यह रैली दिल्ली से पांवटा होते हुए शिमला जाती थी और वापसी में रानीखेत नैनीताल होते हुए दिल्ली पहुँचती थी। अगर आप में से कोई इसकी पुष्टि कर सके तो अच्छा रहेगा। मुझे यही रूट याद है।


हमारे सिरमौर की शानहमारे अपने "मट्टू अंकलकर्नल कुलबीर सिंह चौहान, Regiment of Artillery को रिप्रेजेंट करते थे। मेजर सुखी सिंह सेखों उनके सह-ड्राइवर थे। 1985 में सबसे पहले उन्होंने हिमालयन रैली में भाग लियाजोंगा में। 1985 और 1986 में वह नंबर पांच पर आए। 1989 में वह रैली में नंबर तीन पर रहे और 1990 में नंबर दो पर। इन सभी प्रतियोगिताओं में उन्होंने मारुति जिप्सी का इस्तेमाल किया।


केजेरो शिनज़ुका, जो दुनिया के बेहतरीन ड्राइवरों में से एक थे, के दर्शन हर साल होते थे। केन्या के जयंत शाह भी हर साल मिलते थे, जो दुनिया के बेहतरीन ड्राइवरों में गिने जाते थे।

केनजीरो शिनोज़ुका पहले जापानी ड्राइवर थे जिन्होंने पेरिस-डकार रैली में समग्र जीत हासिल की थी, और साथ ही वर्ल्ड रैली चैंपियनशिप (WRC) के एक चरण में जीत दर्ज करने वाले पहले व्यक्ति बने। 

मूल रूप से गुजरात के जामनगर के रहने वाले जयंत शाह एक केन्याई थे, जो हिमालयन रैली की शान माने जाते थे। उनका नाम आते ही लोग समझ जाते थे कि प्रतियोगिता कड़ी होने वाली है।

यह घटना 1987 की थी। लेकिन उससे पहले जयंत शाह 1982 से 1985 तक नंबर एक आते थे। उन्होंने 1986 में हिस्सा नहीं लिया था। उसके बाद सिर्फ 1987 में हिस्सा लिया और तीसरे नंबर पर आए। इसके बाद उन्होंने हिमालयन कार रैली में हिस्सा नहीं लिया। जयंत शाह 2020 तक ड्राइविंग करते रहे, 77 साल की उम्र तक, लेकिन 2021 में कोरोना की वजह से उनकी मृत्यु हो गई। 


केजेरो शिनज़ुका ने हिमालयन रैली में 1987 और 1988 में हिस्सा लिया और दोनों बार नंबर एक रहे। 1989 का मुझे संशय है। Mitsubishi Starion Turbo चलाने वाले शिनज़ुका 2017 तक ड्राइविंग करते रहे, लेकिन इसी साल मार्च 2024 में उनका पचहत्तर साल की उम्र में देहांत हो गया। 








80 के दशक में "हिमालयन रैली" की कुछ गाड़ियां पांवटा साहिब से रेणुका जी जाते हुए, यहाँ सतौन के गिरी नदी पुल को पार करते हुए. गाड़ियों की आवाज़ पर ध्यान दीजियेगा। 




राजबन में कुछ इसी तरह से कुर्सी टेबल लगा के रैली के अधिकारी टाइम नोट किया करते थे. यहाँ ड्राइवर्स रुक के एंट्री कराते थे. 




सतौन से रेणुकाजी का रास्ता इतना ही दुर्गम था  









Comments

Popular posts from this blog

AI and Filmmaking — What’s Really Changing?

रेज़ॉल्यूट डेस्क VS नाक का गोला

राम वृक्ष