बड़ा तमाशा
आज सुबह जब घर से निकला, तो देखा कि मेन गेट पर गार्ड और आसपास के लोग किसी रहस्यमयी घटना का मूक दर्शक बने खड़े हैं। सबकी निगाहें एक ही दिशा में जमी हुई थीं, जैसे वहाँ कोई विश्व युद्ध हो रहा हो और वे चुपचाप उसकी रिपोर्टिंग कर रहे हों। मैंने सोचा, "कहीं बम तो नहीं फट गया? कोई धरना-प्रदर्शन तो नहीं हो रहा?" पर सामने कोई कर्फ्यू जैसी हालत तो नजर नहीं आए। भीड़ देखकर दिल में अजीब बेचैनी होने लगी। लोगों के चेहरे ऐसे थे, जैसे किसी महान रहस्य का उद्घाटन होने वाला हो, पर रहस्य था कि समझ में ही नहीं आ रहा था।
अब मेरा मन भी बेचैन होने लगा, मैंने सोचा, "कहीं कोई एक्सीडेंट तो नहीं हो गया? या फिर कोई मारपीट?" और फिर एक और ख्याल आया—"अरे भाई, यह सुबह-सुबह खून-खराबा देखना मेरी पाचन शक्ति के विपरीत होगा!" मन में डर बैठ गया, "कहीं कुछ बुरा न हो गया हो?"
सामने से एक लड़का साइकिल पर आता दिखा, उसके चेहरे पर भी वही जिज्ञासा थी जो बाकी लोगों के चेहरों पर छपी हुई थी। साइकिल रोकते ही वह भीड़ का हिस्सा बन गया, जैसे कोई दर्शक अपने पसंदीदा टीवी सीरियल का सस्पेंस जानने को आतुर हो।
अब भीड़ के चेहरों को देख के लगने लगा कि मामला ज्यादा गंभीर तो नहीं है, क्योंकि वहाँ न कोई पुलिस थी, न किसी ने 'हे भगवान!' जैसा नाटक किया था। लोग शांति से खड़े थे। सोचा, "अगर कोई एक्सीडेंट हुआ होता, तो अब तक किसी के हस्पताल पहुंचाने की हड़बड़ी दिखती।" धीरे-धीरे कदम बढ़ाए, मन में अब सवाल कुलबुलाने लगे, "क्या हो सकता है? क्या मैं भी इस रहस्य का हिस्सा बनूँ?"
आखिरकार, जब मैंने उस भीड़ के बीच झाँका, तो जो देखा उसने मेरे दिमाग की सारी कल्पनाओं की धज्जियां उड़ा दीं। वहाँ मुनिसिपलिटी वाले गटर की सफाई कर रहे थे, और लोग उस अद्भुत तमाशे का आनंद ले रहे थे, जैसे विश्व कप का फाइनल देख रहे हों।
अब समझ में आया कि यह गटर सफाई हमारे समाज के लिए भी एक सांस्कृतिक घटना है—तकनिकी खराबी के चलते इलाके का इंटरनेट बंद था, तो लोग लाइव शो देखने आ गए थे। चार कुर्सियाँ भी लग चुकी थीं, जैसे किसी व्याख्यान का इंतजार हो। गोलगप्पे वाला भी अपनी कमाई का ठेला वहीं जमा चुका था, और बुजुर्ग तो मानो इस आयोजन का प्रसाद लेने तैयार बैठे थे।
मैंने राहत की सांस ली। शुक्र है, किसी की जान नहीं गई थी, न कोई खून-खराबा हुआ था। पर समाज के लिए यह सब एक मनोरंजन बन चुका था। इंटरनेट बंद हो तो लोग Reels की जगह गटर साफ़ होते भी देख लेंगे—दोनों में कोई ख़ास फर्क भी नहीं है.
- विवेक तिवारी

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