आतिशी का मुख्यमंत्री बनना: केजरीवाल की हिमालय यात्रा की शुरुआत?


अरविंद केजरीवाल ने एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाते हुए आतिशी को दिल्ली का मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया है। अब हर कोई ऐसे बात कर रहा है जैसे कि अचानक से हर आदमी राजनीति का विशेषज्ञ बन गया हो। "अब तो आतिशी ही दिल्ली का भाग्य बदलेंगी," ऐसा कहा जा रहा है, जैसे मुख्यमंत्री बनना किसी सुपरहिट फिल्म का टिकट मिल जाना हो । यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी गाँव में कोई नई महिला प्रधान बनती है, और लोग उसके अनुभव और योग्यता पर चर्चाएँ शुरू कर देते हैं। स्वाभाविक है. 

राजनीति का एक अजीब सा नियम है—जिसे कुर्सी मिल जाए, वह पहले इंसान रहता है, फिर धीरे-धीरे कुर्सी का हिस्सा बन जाता है। आतिशी भी शायद पहले ‘भारी मन से जिम्मेदारी निभाने’ की बात करेंगी, और फिर धीरे-धीरे कुर्सी की जिम्मेदारी उसी कुर्सी को सौंप देंगी। केजरीवाल का यह निर्णय साहसिक है, पर इसका परिणाम अभी अनिश्चित है। कुर्सी पर बिठाना एक बात है, लेकिन उसे संभालकर रखना बिल्कुल दूसरी बात।

आतिशी के क्षत्रिय होने की खबर से देश में हलचल मच गई है। लोग सोच रहे हैं कि क्षत्रिय होना सत्ता के स्वाभाविक हक की गारंटी है। जैसे सत्ता का स्वाद चखते ही सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी। लेकिन सत्ता में आने के बाद आदमी की सोच बदल जाती है—पहले वह "सेवा" की बातें करता है, फिर धीरे-धीरे "मेवा" की ओर कदम बढ़ाता है। जाति और धर्म की धारणाएँ राजनीति में अब भी मजबूत हैं। कोई दलित है तो मसीहा माना जाता है, कोई मुसलमान है तो गोश्त का तस्कर। सवर्ण है तो क्रूर और पाखंडी। मगर किसी की वास्तविक योग्यता पर बात शायद ही होती है।

आतिशी की पढ़ाई-लिखाई, ख़ासकर ऑक्सफोर्ड से शिक्षा प्राप्त करने की बहुत तारीफ हो रही है। लेकिन राजनीति का असली सबक कापसहेड़ा के सरकारी स्कूलों और दिल्ली के मोहल्लों में सिखाया जाता है, ऑक्सफोर्ड में नहीं। असली सवाल यह है कि आतिशी अपनी शिक्षा का इस्तेमाल कर दिल्ली के लिए कुछ कर पाएंगी, या कुर्सी का भार उन पर हावी हो जाएगा?

यह नियुक्ति राजनीति में एक नई कहानी का आरंभ है, लेकिन इस कहानी का अंत कैसा होगा, इसका जवाब समय ही देगा। जाति और धर्म के आधार पर नेता की पहचान करने की बजाय, यह देखना ज़रूरी है कि वह योग्यता और ईमानदारी से कितना काम कर पाता है।

केजरीवाल ने एक राजनीतिक जोखिम लिया है, पर वे भी शायद जानते हैं कि राजनीति में आज का साथी कल तुम्हारी कुर्सी खींच सकता है। यदि इसमें संशय हो तो बिहार जाकर नितीश कुमार से पूछ लीजिये, या बगल में झारखण्ड के हेमंत सोरेन से.  दस साल में पक्का यकीन है या तो केजरीवाल राजनितिक तिकड़म में महारत हासिल कर चुके होंगे या हिमालय प्रस्थान करने की तैयारी होगी. 

इस नाटक का पहला अंक शुरू हो चुका है। दर्शकों को इसके बाकी अंकों और अंतिम परिणाम का बेसब्री से इंतजार रहेगा। राजनीति के इस नए नाटक में हमें हर दिन कुछ नया देखने को मिलेगा, और शायद अंत में हम यही कहेंगे—“हमें तो पहले ही पता था!" 



- विवेक तिवारी 




Comments

Popular posts from this blog

AI and Filmmaking — What’s Really Changing?

रेज़ॉल्यूट डेस्क VS नाक का गोला

राम वृक्ष