बड़ा तमाशा
आज सुबह जब घर से निकला, तो देखा कि मेन गेट पर गार्ड और आसपास के लोग किसी रहस्यमयी घटना का मूक दर्शक बने खड़े हैं। सबकी निगाहें एक ही दिशा में जमी हुई थीं, जैसे वहाँ कोई विश्व युद्ध हो रहा हो और वे चुपचाप उसकी रिपोर्टिंग कर रहे हों। मैंने सोचा, "कहीं बम तो नहीं फट गया? कोई धरना-प्रदर्शन तो नहीं हो रहा?" पर सामने कोई कर्फ्यू जैसी हालत तो नजर नहीं आए। भीड़ देखकर दिल में अजीब बेचैनी होने लगी। लोगों के चेहरे ऐसे थे, जैसे किसी महान रहस्य का उद्घाटन होने वाला हो, पर रहस्य था कि समझ में ही नहीं आ रहा था। अब मेरा मन भी बेचैन होने लगा, मैंने सोचा, "कहीं कोई एक्सीडेंट तो नहीं हो गया? या फिर कोई मारपीट?" और फिर एक और ख्याल आया—"अरे भाई, यह सुबह-सुबह खून-खराबा देखना मेरी पाचन शक्ति के विपरीत होगा!" मन में डर बैठ गया, "कहीं कुछ बुरा न हो गया हो?" सामने से एक लड़का साइकिल पर आता दिखा, उसके चेहरे पर भी वही जिज्ञासा थी जो बाकी लोगों के चेहरों पर छपी हुई थी। साइकिल रोकते ही वह भीड़ का हिस्सा बन गया, जैसे कोई दर्शक अपने पसंदीदा टीवी सीरियल का सस्पेंस जानने को आतु...