"अर्घ्य" का सफर

किसी किताब को विचार से पन्नों पर कैसे लाया जाए इस अनुभव से मैं कोसों दूर रहा. मात्र लेख या किसी कहानी को लिख डालने में, पटकथा को रचने में और किसी किताब को लिखने में काफी फर्क है. और अगर वो किताब किसी का जीवन वृतांत हो तो कार्य विचार से शोध, शोध से संग्रह, संग्रह से संकलन और फिर शब्दों का एक विशाल पर्वत जिसे लेखक रोज़ सुबह से शाम डूब कर अपने छैनी हतौड़े से एक आकृति का रूप देता है. ये आकृति सिर्फ उसे दिख रही होती है, लेकिन धीरे धीरे, अपनी कला से उसे हर ओर से आकार देकर, पॉलिश करते रहना जब तक वो उस इंसान की आंखें न पढ़ ले जिसका जीवन वृतांत मात्र विचार से शुरू हुआ था . लेकिन मूर्तिकार और कथाकार को शायद इस डर में तपते रहना पड़ता है की जो मूरत उसने अपने दिमाग में बनाई है ज़रूरी नहीं की उसकी दिन रात की मेहनत , सालों की तपस्या, अथाह परिश्रम से बनी मूरत ठीक वैसी होगी जैसी पाठक के मस्तिष्क में घूम रही हो. ये अनुभव मुझे तब हुआ जब मेरे पिता ने अपने पिता पर किताब लिखने की ठानी। मेरे लिए ये सटीक अवसर था, अपने पिता को नज़दीक से जानने का. उन्होंने इस कार्य के लिए ऐसे लेखक को चुना जो कभी मेरे दादाजी से मिले ही नहीं थे. पवन बख्शी एक संवेदनशील लेखक हैं, वो इस कार्य में अपना पूरा अनुभव निचोड़ देंगे इसकी कल्पना भी नहीं की थी. मैंने पूरी प्रक्रिया को बहुत नज़दीक से जिया। पूरी यात्रा को एक दर्शक की तरह अनुभव किया। अपने पिता को एक अति उत्साही और जुझारू पुत्र के रूप में देखा, जैसे वो भी इस अवसर की तलाश में थे की अपने पिता को बहुत नज़दीक से जान पाएं। मेरे पिता मेरे सबसे अच्छे मित्र हैं. मैं उनसे लगभग सभी अनुभव साझा करता हूँ. मुझे उनसे डर तो लगता है क्योँकि वो "बाप" हैं लेकिन मुझे मालूम है की उनसे मैं अपने दिल की कोई भी बात कर सकता हूँ, क्योँकि शायद वही एक मात्र व्यक्ति हैं जो मुझे अंदर तक समझते हैं. लेकिन ये विलास उनके पास नहीं था. उस ज़माने में पिता और पुत्र में एक बहुत बड़ा फ़ासला था. मन को मारना पड़ता था. मैं जब चाहे, मन करे अपने पिता को ज़ोर से गले लगा सकता हूँ, लेकिन मेरे पिता के लिए अपने पिता को गले लगाना उतना आसान नहीं था. सिर्फ हाल चाल पूछ लेना ही मधुर सम्बन्ध की व्याख्या थी. बहुत कम उम्र में अपने कार्यक्षेत्र के चलते वह अपने पिता से काफी दूर आ गए, और फिर मेरे दादा जी की मृत्यु तक एक बहुत बड़ा समय एक खालीपन छोड़ गया. उस खालीपन की भरपाई एक श्रधांजलि "अर्घ्य" के रूप में हम सब बहुत जल्द पढ़ेंगे। लेकिन "अर्घ्य" का सफर इतना आसान नहीं था. न पवन बख्शी जी के लिए न ही मेरे पिता जी के लिए. ये मान लेना की इस कार्य के विचार मात्र सुन लेने से ही सभी इसमें योगदान देने के लिए आतुर हो जायेंगे और जो भी सामग्री उनके अधिकारक्षेत्र में होगी वह चुटकी बजाते ही उपलब्ध हो जायेगी, एक भूल होती। लेकिन फिर भी जिससे जो बन पड़ा उसने अपनी क्षमता के हिसाब से योगदान दिया। किसी ने घटना के रूप में, किसी ने पत्र के रूप में, किसी ने लेख के रूप में, किसी ने विचार के रूप में. 

मेरे एक परम मित्र से एक बार मैंने व्याकुलता में यह बात बताई और मुझे लगा की वह किताब की प्रगति के बारे में बात करेगा, लेकिन अफ़सोस हुआ जब वह "इससे होने वाले फायदे और नुकसान" पर चर्चा करने लगा. उसके हिसाब से ये समय व्यर्थ करने का प्रोजेक्ट था क्योँकि इससे कोई भी आर्थिक फायदा उसे नज़र नहीं आया. वो दोस्त अचानक परम मित्र से तुच्छ की श्रेणी में पहुँच गया. एक महाशय का साक्षात्कार लेने पवन जी पहुचे तो उन्होंने इस किताब के पीछे "लाभ" किसका है? पर सवाल उठाना बेहतर समझा। कष्ट तब और हुआ जब अभिदाता तमाशबीन दिखा. ये सफर सकारात्मकता से शुरू हुआ था और जब भी नकारात्मक सोच ने घेरने की कोशिश की तो इस कल्पना के सूत्रधार मेरे पिता ने उसे भूल सिर्फ किताब पर ध्यान केंद्रित किया। और ये बहुत बड़ी सीख थी. हम अक्सर नकारात्मक सोच पर भावुक हो मूल से भटक जाते हैं और ध्यान वहीं उद्दिग्न हो जाता है. लेकिन क्या किताब उस नकारात्मक सोच के बारे में है? गाड़ी तो अब चल पड़ी थी. इसमें असहयोग का स्थान तो था, लेकिन रुकना विकल्प नहीं था. और बस पवन बख्शी जी भी चलते रहे. 

मंगला राय जी के अपने अनुभव साझा करते हुए ज़ोर से अट्टहास लगाना, मुंशी दीनानाथ लाल श्रीवास्तव का ८० साल की उम्र में भी मेरे पिता को खुद चल कर दरवाज़े तक छोड़ के आना, भरौली स्कूल के अध्यापकों का मेरे पिता से बैजनाथ तिवारी का नाम सुनते ही मिलने आना, मेरे दादा जी के चपरासी सुरली के परिवार का मेरे पिता के उनके द्वार पर आने पर भाव विभोर होजाना, उस अन्नपूर्णा होटल के मेनेजर का अवाक हो जाना जहाँ दादाजी आजमगढ़ में रुका करते थे, या फिर मेरे दादा जी के जीवन काल में धूर विरोधी रहे बाबु जंग बहादुर सिंह का उन्हें याद करते हुए फ़फ़क कर रो पड़ना , किताब इन्हीं लोगों के बारे में तो हैं जिन्होंने मिल कर पंडित बैजनाथ तिवारी की शख्सियत को रूप दिया। उस पर्वत के असली मूर्तिकार ये सब हैं. कोशिश है की उस पर्वत में आपको भरौली के प्रिंसिपल साहब पंडित बैजनाथ तिवारी की वही मूर्ती दिखे जिसकी कल्पना लेखक पवन बख्शी ने की है। मेरे पिता जी के लिए उनके अपने पिता को बहुत नज़दीक से देखना, उनके जाने के अट्ठाइस साल बाद, मेरे पिता के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है. मुझे मेरे पिता को नज़दीक से जानने का मौका मिला, मैं अपने को भाग्यशाली मानता हूँ. लेकिन सबसे बड़ी सीख जो मुझे मिली की ऐसा अवसर मिले तो छोड़िएगा नहीं। इस यात्रा से जुडी कुछ फोटोज आपके सामने रख के अपने विस्मयकारी अनुभव को साझा करने की छोटी सी कोशिश। 
विवेक तिवारी













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