(क्लीन पांवटा ग्रीन पांवटा, CPGP, पांवटा साहिब नामक हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से शहर में नागरिकों द्वारा चलायी गयी एक मुहीम है. जहाँ उत्तराखंड के कुल्हाल के बाज़ार से ब्रहस्पतिवार को हिमाचल आने वाली पॉलिथीन को सीमा पर ही रोकने की कोशिश होती है. पांवटा के हिमाचल और कुल्हाल के उत्तराखंड के बीच यमुना नदी पर एक पुल है और वही पुल हिमाचल और उत्तराखंड को जोड़ता है )
पुल पुराण
गुरुवार का महत्व हम सभी जानते हैं. गुरुवार का सम्बन्ध एक ग्रह से है, जिसे अंग्रेजी में ज्यूपिटर कहते हैं, और सभी जानते हैं की साबू ज्यूपिटर का वासी था, और चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ है. गुरुवार का महत्व कुल्हाल और पांवटा के बीच भी जोरदार है. मसला तो सदियों से चला आ रहा है लेकिन पिछले एक साल से जो मंज़र पुल पर देखने को मिलता है उसे देख के लगता है जैसे कुल्हाल- पॉलिथीन नाम की अपनी निकृष्ट बेटी - पांवटा जैसे बांके, सुन्दर, यथेष्ट, दयालु, रूपवान लड़के से जबरदस्ती ब्याहने पर तुला है. खैर, ये लोगौं के थैले से एक साल से इतनी पॉलिथीन निकल गयी की आस पास के गाँव तक सड़क पहुँच गयी. जी हाँ कुल्हाल से पकड़ी गयी पॉलिथीन का इस्तेमाल P W D रोड बनाने में करती है. अब उसी रोड को पकड़ कर कई लोग और जल्द कुल्हाल पहुँच जाते हैं, सब्जी, मछली, पकोड़े, कटहल और अन्य साजो सामान पॉलिथीन में लेके वापस पांवटा आने के लिए. अब होता कुछ यूँ है की गुरुवार को सभी CPGP के लोग पुल पर कागज, कट्टे, जूट के बैग लेकर अचानक साबू बन जाते हैं, ध्यान रहे साबू ज्यूपिटर का वासी है, और गुरुवार का ब्रहस्पति ग्रह से सम्बन्ध है. लेकिन ये साबू लोग बड़े अजीब से हैं, हाथ जोड़ कर, पाँव जोड़ कर, शीर्षासन कर, मयूरासन कर, हट आसन कर, क्रोंचासन कर, चातक आसन कर, काक आसन कर लोगों को पॉलिथीन नाम की कुल्हाल की बेटी से बचने की नसीहत देते हैं. लेकिन ये साबू भूल जाते हैं की चाचा चौधरी का दिमाग कंप्यूटर से भी तेज़ है. कुल्हाल से पॉलिथीन लाने वाले गुरुवार को चाचा चौधरी बन जाते हैं. असल ज़िन्दगी में दिमाग नाम का पुर्जा भले देर सवेर चलता हो, लेकिन पॉलिथीन को कैसे पार करना है इसपर अनेकों किताब लिख सकते हैं. इन चाचा लोगों को आधे रस्ते तक पॉलिथीन लाने में सबसे ज्यादा मज़ा आता है. इस बात का लुत्फ़ वही जान सकता है जिसने पुल के बीचो बीच पॉलिथीन फाड़ी हो. सर्र सर्र चलती हवा, पुल पर मीठा मीठा नदी के पानी सा संगीत, सुहाना मौसम, नीला आसमान, उड़ते पंछियों के बीच, हौले से अपने बैग से एक पॉलिथीन निकालना, उसे हौले हौले नोच नोच के फाड़ना, और हौले हौले नदी मैं बहाना इतना आन्दित कर देता है मानो अपनी प्रेयसी के बालौं में आप उंगलियाँ फेर रहे हों. मुझे इस आनंद की अनुभूति तब हुई जब मैं खुद बैरियर की जगह पुल के बीचों बीच खड़ा होक खुद इस बात का अनुभव करना चाहता था. उस दिन मैं योद्धा बन सबकी आँखों का तारा बनना चाहता था, में हर पॉलिथीन ध्वस्त कर देना चाहता था, मुझे लगा मुझमें साक्षात् अभिमन्यु का वास है, मैं अकेले ही इस चक्र्यव्युह को भेदने का माद्दा रखता हूँ. और मैं मतवाले हाथी की तरह, बिगुल बजाता पुल की ओर धावा बोलने की इच्छा से उड़ चला. मैं यमुना पुल की तरफ हवा में तैर रहा था. जैसे जल में मछली फुर्फुराती पानी को चीरती सर्प सी गजगामिनी हो जाती है. और मैं पहुँच गया. मेरे माथे पर तेज था, आँखों में क्रोध, चेहरे पर प्रताप, मुझे लगा मानो मुझे देखते ही पॉलिथीन लाने वाला व्यक्ति आत्मग्लानी से यमुना में कूद पड़ेगा. लेकिन अफ़सोस ये सब सिर्फ मुझे ही दिखाई दे रहा था, और किसी को नहीं. मेरा भ्रम तब टूटा, जब मैंने दूर से एक व्यक्ति को देखा जो पांवटा से कुल्हाल जा रहा था. हालांकि वो मेरे किसी काम का नहीं था, क्यूंकि पॉलिथीन पांवटा से ले जाता और कुल्हाल फेंक आता तो मेरा मित्र ही था, लेकिन फिर भी उसकी डगमगाई चाल से मैं प्रभावित हुआ. और उसने तुरंत अपनी जेब से एक गुटखे का पैकेट निकला, मू से फाड़ा और हवा में उछाल दिया, उसे पता था खाली पैकेट यमुना में कूदने को आतुर है, वो पानी की शोभा बढाने के लिए यमुना की ओर उड़ चला. मैं अवाक सा उसकी ओर बढ़ा, मैंने उसे आत्मग्लानी के सागर में गोता लगवाने की ठान ली थी. मैंने उसे नमस्कार किया और पुछा “भाई ये आपने क्या किया?” मुझे लगा वो मेरा प्रश्न सुनते ही पानी पानी हो जायेगा. लेकिन उसने मुंह में भरी पीक वहीं मेरे सामने रोड पर थूकी और पुछा “क्या? क्या कर दिया मैंने?”. मुझे समझ आ चुका था मैंने व्यर्थ ही उसके आनंद में विघ्न डाला है. वो फिर बोला “बताइए? क्या पूछना चाहते हैं.... मेरे पास उसका उत्तर है” वो पहले ही मेरा प्रश्न जनता था और उसके उत्तर को देने के लिए उतावला हुआ जा रहा था... मैंने थक के पूछ ही लिया “आपने यमुना में पैकेट फेंक दिया, और तो और रोड पे पीक मार दी”... लेकिन मैं भूल गया वो तो चाचा चौधरी था, उसका दिमाग कंप्यूटर से तेज़ था. उसने तुरंत उत्तर देने शुरू किये “जाओ पहले उसे रोको जो यमुना में फूल माला फेंकता है, जाओ पहले उन फक्ट्रियौं को बंद करो जो सारा कचरा यमुना में फेंकती हैं” मुझे अचानक वो अमिताभ बच्चन लगा, फिल्म दीवार वाला विजय “जाओ पहले उस आदमी का साईन लेके आओ जिसने मेरे हाथ पे ये लिख दिया......... हयीं”. मैं उसे बस देखता रहा. वो मुझसे भी ज्यादा गुस्से में था, शायद उसे रोज़ कोई न कोई टोक के उसको गुटका खाने से पहले ही कुछ न कुछ बोल देता था और वो हिमाचल छोड़ कुल्हाल इत्मीनान से गुटका खाने निकला हो और बीच में मैं मिल गया. बहरहाल मैं उससे माफ़ी मांग के चला गया, लेकिन फिर भी वो पीछे से दो चार डायलाग बोले जा रहा था “जाओ पहले उसे टोको.... जाओ पहले उसे रोको... जाओ पहले उसे पकड़ो” लेकिन वो खुद अपने को रुकवाना, टुकवाना और पकड़वाना नहीं चाहता था. मेरा पहला दांव फेल हो चूका था. लेकिन अभी भी कुछ्छ तेज बरकरार था. तभी मैंने देखा एक इ रिक्शा वाला, जैसे गाय जुगाली करती है वैसे मुंह चलाता आराम से बीच पुल पर खड़ा था, खचा खच्च सवारी लिए. लेकिन आखिर वो क्योँ रुका था? मैं उससे पूछना चाहता था... मैं उस की ओर बढ़ा… अभी भी मेरे कान में आवाज़ पड़ रही थी “जाओ पहले उसे रोको.... जाओ पहले उसे मारो” लेकिन मेरा फोकस अब वो इ रिक्शा वाला था. मैं उसके पास पंहुचा, दायें देखा तो सवारियां, आराम से अपने बैग से निकाल निकाल कर पॉलिथीन फाड़ रही थी. ये दृश्य ऐसा था मानो कोई लम्बी दूरी की ट्रेन उत्तर प्रदेश के किसी दूर दराज़ के रेलवे स्टेशन पर रुकी हो और भूखे यात्री, इत्मीनान से चाट पकौड़ी खा रहे हो, चाय पी रहे हों क्यूंकि यहाँ ट्रेन काफी देर रूकती है. ड्राईवर के माथे पर कोई चिंता के निशाँ नहीं थे, वो वहां जीवन भर रुकने के इरादे से खड़ा मालूम पड़ता था. मैंने पहुँचते ही पुछा “यहाँ क्योँ खड़े हो?” उसके पास जवाब तैयार था (हमेशा याद रखिये, चाचा चौधरी का दिमाग .....) वो बोला “पॉलिथीन फड्वा रहा हूँ, हिमांचल में पॉलिथीन नहीं ले जाने देते” मैंने, यानी बौना साबू ने फिर पुछा “वहां बैन है तो यमुना में फिंकवा रहे हो?” वो बोला “जी .......हाँ” उसके चेहरे पर गर्व था. वो मुस्कुराया जैसे आज ही वीर चक्र प्राप्त कर लेगा. रिक्शा मैं बैठे लोग पॉलिथीन यमुना में फेंकते हुए मुस्कुरा रहे थे, जैसे कह रहे हो “देखो हम कितना सोचते हैं अपने पांवटा के बारे में, हम पॉलिथीन सिर्फ आधे रस्ते तक लाते हैं” अब मेरे गुस्से का बाँध टूट चूका था मैं उसे झाख्झोरना चाहता था लेकिन अचानक मुझे साबू मनिंदर सिंह का वो फोटो याद आया जिसमें उन्होंने लट्ठ पकड़ी थी, मैं उस फोटो में घुस कर वो लट्ठ छीन कर झूमर डांस करना चाहता था.... वो आवाज़ अब भी आ रही थी “जाओ पहले उसे टोको....... “ तभी देखा एक दंपत्ति पीछे खड़ी पॉलिथीन फाड रही है, मैं उस ओर दौड़ा, और इधर चतुर और चालाक रिक्शा वाला भाग खड़ा हुआ, तब तक दंपत्ति ने अपने स्कूटर पर किक मार दी, मैं उधर भागा, लेकिन तभी एक लड़के को मैंने दूसरी तरफ थैले उतारते देखा, दंपत्ति मुझे रौंद ते हुए सरपट हो गए, लड़का भी ग़ायब हो गया, कुछ नए लोग दिखे जो कभी भी थैला उतार सकते थे, वो गुटखा खाया इंसान अभी भी मुझे चिल्ला चिल्ला कर नसीहत दे रहा था. मैं तिलचट्टा बन गया था, मुझे कुछ न सूझता था, मुझे लग रहा था मैं स्टेज पर रामलीला कर रहा हूँ और सीता का रोल निभा रहा हूँ, और इस दृश्य में सीता को मालूम पड़ा की राम आने वाले हैं, और सुध बुध खोयी सीता कभी इधर कभी उधर दौड़ रही हैं. तभी आकाशवाणी हुई “बेटा तुमसे न हो पायेगा”. मैं वहीं बैठ गया सर पकड़ कर, मैं और भी सुकड़ा साबू बन चूका था और मेरे चारों तरफ कई चाचा चौधरी स्लो मोशन में इधर से उधर थैला निकाल कर, ताली ठोंक के पॉलिथीन फाड़ रहे थे, उन सबके चेहरे पर अजीब सा सुकून था. उनको ये करने में मज़ा आ रहा था. मैं फुस्स गुब्बारा था, मुझे खुद ही अपने में हवा भर के मुहीम को आगे बढ़ाना था. मैंने फिर अपना फन लहराया, और फुंफकारते हुए दायें देखा फिर बाएं देखा, मुझे दायें ज्यादा आकर्षक लगा, मैंने उस ओर एक पतला सा आदमी देखा, जो पॉलिथीन फाड़ रहा था, लेकिन उसकी नज़र पूरी तरह से पांवटा बैरियर पर थी, वो जल्द से जल्द सारी पॉलिथीन फाड़ देना चाहता था, वो इस काम में निपुण था, जैसे हर गुरुवार वो यही करता हो, या फिर उसने यह नया धंधा इजाद किया हो की वो दूसरों के १० थैले १ मिनट में फाड़ने के १० रुपये चार्ज करता रहा हो. क्यूंकि कुछ लोग पीछे थैला लिए खड़े थे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे, लाइन लम्बी होती जा रही थी, मैं फुंफकारते हुए पंहुचा. आते ही मैंने उससे बोला “मैं कुछ मदद करा दूं?” उसने तुरंत मुझे उत्तर दिया (*चाचा चौधरी) “पैसे नहीं दूंगा, volunteer है तो फाड़ बैठ के”.... मैं उसके साथ बैठ के जल्दी जल्दी पॉलिथीन फाड़ने लगा , वो बोला “मेरा मुंह मत देख... जल्दी कर ना..... वो देख सरदार आ रहा है”... मैंने देखा साबू मनिंदर पांवटा से पैदल चल दिए थे.... चाचा पॉलिथीन जल्दी जल्दी फाड़ने लगा.... लेकिन उसकी नज़र साबू से हटती न थी. वो पूरी तन्मयता से फाड़े जा रहा था, वो इतना परिपक्व हो चूका था, की बिना देखे ५-६ पॉलिथीन फाड़ देता था. मनिंदर के कदम इस ओरे बढ़ रहे थे, हमारे हाथ जल्दी जल्दी चल रहे थे. अब मैं कुल्हाल से आये ग्रुप का हिस्सा था, उधर मनिंदर इधर चाचा, उधर बढ़ते कदम, इधर चलते हाथ, उधर साबू, इधर चौधरी, दोनों चीज़ें जल्दी जल्दी चल रही थी. जिस तेज़ी से कदम बढ़ते उसी तेज़ी से पॉलिथीन फटते. भीड़ की नज़र मनिंदर के कदम पर थी, वो जल्दी जल्दी अपना थैला चाचा की तरफ बढाते. चाचा थैला सूंघ के बता देता था की अन्दर कितनी पॉलिथीन है, वो मुझे हीन भावना से देख रहा था, क्यूंकि मैं अपना काम बढ़िया नहीं कर रहा था, मैं पन्नी फाड़ने का काम तेज़ी से नहीं कर पा रहा था, चाचा ने लगे हाथ उसी स्पीड से मेरी जेब में एक कार्ड खिसका दिया, जिसपर उसके पन्नी फाड़ने के ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट का नंबर था, जब से ये मुहिम चली उस पार कई तरह के धंधे खुल गए थे. चाचा कभी मुझे घूर के जल्दी जल्दी हाथ चलने का निर्देश देता, कभी मनिंदर के कदम देखता, भीड़ को पसीने आरहे थे, एक लड़का सबका पसीना पोंछ रहा था, भीड़ जाते जाते उसे १ रुपये दे जाती थी. चाचा आज मेरा बॉस था. मनिंदर मुझे देख के थोडा ठिठके, और फिर खतरा न देखते हुए वापस पलट गए, चाचा ने लम्बी सांस ली, लेकिन चाचा समझ नहीं पाया की मैं किस टीम का हिस्सा था, मैं खुद कंफ्यूज था की मैं किस टीम का हिस्सा हूँ. खतरा टल गया था. मैंने खुद लम्बी सांस ली. मैंने देखा चाचा लगभग ३ किल्लो पन्नी बटोर चूका था. उसे देखते ही मेरे अन्दर फिर अजगर ने प्रवेश किया, मैंने फन लहराया और फुंफकार “चाचा इस पन्नी का क्या करना है?” चाचा ने तुरंत रिप्लाई मारा - “जमुना जी ...”.... “नहीं चाचा जी, साबू देख लेंगे, पुल पर कैमरा लगा है”... चाचा टेंशन में आ गया, “तो क्या करें”... “चलो चाचा जी वापस कुल्हाल छोड आयें”.... “चुप बे वहीं से तो लाया हूँ, वापस आधा किलोमीटर कौन जाएगा?”.... “तो क्या हम इसे पांवटा मैं जमा करवा दें”.... “अबे मरवाएगा क्या? वहां चालान हो जाएगा” ... अब चाचा को मुझपर शक होने लगा था ... मैंने साहस बटोरा और कहा “चाचा क्योँ न हम इसको खा लें”
चाचा का शक यकीन में बदल रहा था, मैंने आगे कहा “देखो चाचा हम वैसे भी धीरे धीरे ये ज़हर फैला ही रहे हैं, इससे अच्छा इसे खा के एक बार मैं ही काम तमाम... क्या कहते हो?” भीड़ मुझे घूर रही थी, चाचा ने मुझे देखा और दांत भीचते हुए बोला “तू पागल है क्या?” ..... चाचा के शब्दों ने मेरे कान में मिसरी घोलने का काम किया, मेरे कानो में अभी भी आवाज़ आरही थी “पहले उस आदमी को पकड़ो.......” .... मैं उठा, और मैंने चाचा को भी अपने साथ उठते देखा, भीड़ के हाथ में पत्थर थे, मेरे चेहरे पर मुस्कराहट थी, आज मैं शहीदों की फेहरिस्त में आने वाला था, मुझे लगा मानो पुल पर अचानक वो गाना बजने लगा हो “कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियौं.....” उन्होंने पत्थर मारना शुरू किया लेकिन एक भी मुझे न लगा, मैंने देखा तो मेरे पीछे एक कुत्ता था, जो भाग रहा था, ओ मैं यूँ ही भाव खा रहा था, मुझसे बेहतर तो वो कुत्ता था जो पत्थर खा रहा था. चाचा एंड पार्टी वहां से जा चुकी थी.... उनके लिए मैं यूँ ही कोई बकलोल पागल था जो बडबड करना जानता है. मेरे कदम वापस पांवटा बरियार की तरफ बढ़ गए. वहां मेरे जैसे कई ज्यादा वाले पागल खड़े थे, सब बकलोल साबू थे, जो बारिश में खड़े होकर कुल्हाल से आने वाले चाचा चौधारियौं को अपने कंप्यूटर से तेज़ दिमाग को बेहतर जगह लगाने का अनुरोध कर रहे थे. मैं तो पुल पर तीनो बार फेल हो चूका था, लेकिन बरियार पर मैं इस बात पर गौरवान्वित महसूस कर रहा था की मैं भी “पागल” की श्रेणी मैं आ चुका था.
-विवेक तिवारी-
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