होली मेला भ्रमण
लगभग 20 साल बाद अपने शहर के होली मेले में जाने का मौका मिला. अब मैं मेट्रो शहरी हो चूका था, इसलिए कैमरा कंधे पर लटकाए, टोपी सर पर लहराए, काला चश्मा आँखों पे सजाये, मैं मेले का हर लुत्फ़ उठा लेना चाहता था. जैसे अमरीका लन्दन से देसी लोग आके गाये भैंस की फोटो खींच के महान बन जाते हैं वैसे ही मैं भी जलेबी और रसगुल्ले की फोटो खींच खींच के उस फेहरिस्त का हिस्सा बनने के लिए मचल रहा था. गया तो था फोटो लेने लेकिन माहौल में डूब गया और भूल गया की किस काम से निकला था. सहारनपुर से ख़ास पनवाड़ी आया था, जिसकी खासियत थी की वो ग़ज़ल गाके आपके मुंह में पान ठूंस देता है, मैंने इत्मीनान से पूरी ग़ज़ल सुनी और उसने पान गले तक हाथ डाल कर खिलाया. आस पास के गाँव वाले उससे बहुत प्रभावित नहीं दिखे, उसकी ग़ज़ल को बीच में ही टोक के उससे और सुपारी डालने की डिमांड करते दिखे, ग़ज़ल से ज्यादा उनका पान में इंटरेस्ट था. आर्टिस्ट को ठेस पहुँची पर उसने कत्तई ज़ाहिर नहीं किया. तभी किसी ने पान खा के मेरे कैमरे पर पीक मार दी. जब तक मैं समझ पाता वो इंसान भीड़ में गायब हो गया और काफी देर बाद मुझे मौत का कूआं में मोटर साइकिल चलाता दिखा. मैं जब तक चिल्ला कर अपना आक्रोश जताता तब तक वो 25-30 चक्कर काट कर मुझे बेहोशी की हालत में ला चूका था. ऐसा लगा मानलो वो ख़ास इसी दिन के लिए इस कला में निपुण हुआ था. भुनभुनाता मैं वापस आकर मेले में टहलने लगा. मुझमें जायंट व्हील (Ferris Wheel) पर चढ़ने की हिम्मत नहीं बन पा रही थी, मुझे झूले पर विश्वास नहीं था, मुझे यकीन था की झूला इतने लोगों में सिर्फ मुझे ही चुनेगा और मुझे ही पकड़ कर ऊपर से नीचे टपका देगा. और हो सकता था भरभरा कर बिखर जाए. लेकिन झूले वाले से बात कर उसे मैंने समझाया की भैया मुझे बोगी में बिठाके हौले हौले झूला ऊपर लेजाओ. जब तुम्हारा झूला ठीक ऊपर होगा रुकवा देना मुझे ऊपर से दो फोटो लेने हैं, फोटो लेते ही मुझे नीचे उतार देना क्यूंकि मुझे झूला नहीं झूलना है. उसने सर तो हिला दिया, लेकिन जैसे ही मैं बोगी में चढ़ा उसने पूरी ताकत से झूला चला दिया. मैं चिल्लाया की ये धोखा है, लेकिन पान से सने दांतों को निपोरते वो पूरी ताकत से चिल्ला रहा था “अब तोह झुल्ला 10 मिनट बाद ही रुकेगा”. और उसने कोई मोटर नुमा चीज़ का बटन दबा दिया, मेरी सांस थम गयी, पेट की आंते कोलाहल करने लगीं, झूला तेज़ी से ऊपर जा रहा था, और देखते ही देखते मैं आसमान में पहुँच गया और उसी स्पीड से वापस जमीन की तरफ बढ़ने लगा, मेरी आँखों के गोले मेरे जमीन पर पहुंचने से पहले ही जमीन पर पहुँच रहे थी, मेले कर हर इंसान मुझे डरावना लग रहा था, हर दो सेकेंड में झूला उस पान खाए दांत वाले इंसान के पास से गुज़र रहा था, वो डरावनी आँखौं से मुझे देखते हुए फिर कोई बटन दबाता, स्पीड और बढती और झूला फिर ऊपर. समझ नहीं आरहा था की में झूले से गिर चूका हूँ की प्रक्रिया यही है. लगभग 2 मिनट गुज़र चुके थे, लेकिन लगा मान लो सदियाँ गुज़र गयीं अब और नहीं सहा जा रहा था. अब किसी भी वख्त मैं चिल्ला सकता था, लेकिन चिल्ला कर नीचे खड़े कुच्छ जान पहचान के लोगों में अपनी छवी धूमिल नहीं करना चाहता था, छोटे शहर की गरिमा बरकरार रखने का दारोमदार भी मेरे कन्धों पर था. टूटी फूटी बोगी, जो हर तरफ से खुली थी, ताड़ी पिए हाथी की तरह मतवाली हुई पड़ी थी. जैसे उसे मुझमें कोई शिकार नज़र आरहा हो. मैंने आँखें बंद कर भगवान् को याद करना ठीक समझा, लेकिन तैंतीस करोड़ में से किस भगवान् को याद करू? काफी दिन से याद भी नहीं किया था, अब जिसको याद करू वही भगवान् बदला लेने के लिए पटक सकते थे. दायें बाएं हर चीज़ घूमे जा रही थी, मुझे लगा जैसे आगे का जीवन इसी झूले पर यूँ ही बीतने वाला है. अचानक दिन का खाया खाना भी याद आने लगा. तो क्या सब कुच्छ बाहर आने को व्याकुल था? नहीं नहीं ऐसा किया तो नीचे खड़े लोग राजमा चावल से सरा बोरे हो सकते थे. मेले में नीचे खड़े कुच्छ लोग मेरी तरफ इशारा कर रहे थे, उनके चेहरे पर तनाव था, कहीं मैं झूले के सरिये में फंस के लटका हुआ तो नहीं था? और वो इमरजेंसी में चिल्ला रहे थे? नहीं शायद ये मेरा भ्रम था. तभी मुझे किसी ने हिलाया. “अंकल उतर जाओ झूला बंद हो गया है”. सब कुच्छ थम चूका था. डर गुस्से में तब्दील हो चूका था, ये आदमी अंकल किसे बोल रहा है? क्या मैं अंकल हो चूका था? 20 साल पहले इसी झूले पर चलते हुए हम खड़े हो जाते थे और झूला बंद ना करने के अपील चिल्ला चिल्ला कर करते थे. झूला वाले ने मेरी भावनाओ को ठेस पंहुचायी थी. गुस्से से मैंने दूसरी तरफ देखा तो मुझे एक आईना दिखा, जिसमें मेरी शकल फूली सी दिख रही थी, मैं डर गया की ये मुझे क्या हुआ, मेरी शकल भैंस जैसी कब हो गयी. मैंने आईना उठाया तो वो कुच्छ मेग्निफ्यिंग गिलास टाइप चीज़ थी. दूकान दार समझाने लगा की ये आईना नहीं है, इसके पीछे मोबाइल फ़ोन रक्खो तो मोबाइल फ़ोन बड़ा दीखता है. पता नहीं वो क्या था, पर उस दूकानदार ने मुझे पिछड़ा साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लोग उस चीज़ को तुरंत खरीद लेना चाहते थे. तभी उसने सेल्फी स्टिक दिखा के मुझे प्रभावित करने की कोशिश की. वो जल्दी से जल्दी बहुत सारी सेल्फी स्टिक बेच देना चाहता था. मेले में वही एक चीज़ थी गोल गप्पे के बाद जो धडाधड बिक रही थी. हर दूसरा इंसान सेल्फी स्टिक का थोक विक्रेता था. बेचने की जल्द बाजी में उसने स्टिक ही मेरी आँख में भोंक दी. मैं बिलबिला गया, आँख सूज गयी लेकिन उसका मन नहीं पसीजा. मैं जब तक होश में आया मेरा कैमरा गायब था. मैं चोरी की तोहमत लगाने ही वाला था की मैंने लेन्स को एक तरफ नाली तरफ तेजी से भागता हुआ देखा, वो लुढ़क कर जल्द से जल्द नाली में डूब जाना चाहता था. मैंने पूरी ताकत लगाके उसे बचाया, लेकिन तब तक 25-30 लोग मेरे कैमरे पैर चढ़ कर उसका मलीदा बना चुके थे. मेले के सारे सबूत अब मिट चुके थे. मेला भ्रमण अब समाप्त हो चूका था. चावल पर नाम खुदवाने की इच्छा को मैंने पूरा ना करना ही बेहतर समझा. मेरा मेट्रो शहरी भूत काफूर होचुका था, टोपी पसीना पोछने के काम आरही थी. चश्मे के नाम पर सिर्फ फ्रेम बचा था. जूते पर गोबर लगवा के मैं घर की ओर लंगड़ाता हुआ कूच कर गया.
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