राम वृक्ष








राम वृक्ष केला बेचते दिखे. सुबह सुबह कैमरा उठा कर सड़क पर कहानी ढूंढने के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए जब चला तो  पीले पीले सुन्दर केले देख के मन हुआ दो चार ले चलूँ। केले वाले बाबू कैमरा देख कर थोड़े विचलित दिखे, अक्सर लोग कैमरा देख कर सचेत हो जाते हैं. मैंने उनकी सहमति से दो चार फोटो भी खींच ली. पैसा देकर जैसे ही चलने लगा राम वृक्ष ने हाथ जोड़ कर एक कहानी सुनानी शुरू कर दी.
"साहब दूसरा दिन है ठेला लगाने का, ठेले के मालिक को बड़ी मुश्किल से मनाया की पैसे नहीं हैं,  एक आध दिन में कमा के दे देंगे" 

मेरे अंदर के बचे खुचे इंसान ने उनकी कथा सुन  उनका मन हल्का हो जाने तक रुकने का संकेत दिया, मैंने उन्हें  हाथ न जोड़ने का आग्रह किया और पुछा "आप कहाँ से हैं?"

वे आगे बोले "फत्तेपुर, उत्तर प्रदेस। तीन महीना हुआ आये लेकिन पैसा नहीं जोड़ पा रहे. मानियेगा नहीं साहब लेकिन इतना पैसा भी नहीं है की खैनी खा पाएं" 
"खैनी?"
अपनी जेब से एक पुड़िया निकाल कर खैनी का चूरा दिखाते हुए बोले "ये देखिये साहब झूठ नहीं है"
मेरे अंदर के इंसान ने मुझे वहां से तुरंत निकल जाने का आदेश दिया।
 मुझे नहीं पता राम वृक्ष अचानक हाथ जोड़ कर मुझे अपनी कथा क्योँ सुना रहे थे, शायद मेरे हाथ में कैमरा देख उन्हें मुझसे कोई उम्मीद रही हो, जिसपर मैं खरा नहीं उतर पाया। लेकिन एक बात जिसने मुझे सोचने पर मजबूर किया, कि खैनी ना खा पाना गरीब होने और भूखा होने का मापदंड है?

Comments

  1. खैनी उत्तर प्रदेश और बिहार में एक सस्ता नशा है और नशा एक तरह की luxury !! अपना रामवरिक्ष उसस luxury से महरूम है इस शहर में

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  2. सही कहा आपने. मेरा ब्लॉग पढने के लिए शुक्रिया. विलम्ब के लिए क्षमा

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