स्वच्छ और हरित पांवटा


अगर अपनी स्मरण शक्ति पर किंचित भी भरोसा करूँ तो ताली ठोक के इस बात को तो कह ही सकता हूँ की ये घटना आपके साथ भी गुज़री होगी अगर आपने पांवटा साहिब में शिक्षा दीक्षा ली है तो . भले डी.ए.वी  हो, गुरूनानक हो, सरस्वती हो, या तारुवाला हम सबकी क्लासेज में एक आर्ट की क्लास जरूर होती थी. उस आर्ट की क्लास की अध्यापिका हमें हमेशा उस सफ़ेद ए 4 साइज के पेपर पर एक सीनरी बनाने को कहती थी. मुझे यकीन है की वह सीनरी हम सब ने बनायीं है. उस सीनरी में सबसे पहले एक पहाड़ बनता था, तीन पहाड़ों के बीच में एक सूरज बनाया जाता था, उसमें से किरणे भी बहती थी. किसी की सीधी, किसी की टेढ़ी मेंढ़ी। पहाड़ों के ठीक नीचे एक झोपड़ी बनती थी. कुछ हरे पेड़ थे, और पर्वतोँ से निकल कर झोपड़ी के पास से गुज़रती, ए 4 साइज के सफ़ेद पन्ने  के कोने में न जाने कहाँ खो जाने वाली एक नीली सी नदी. जो ये तथाकथित सीनरी जल्द बना लेते थे वो उसे और बघार देने के लिए और अपने हिसाब से खूबसूरत बनाने के लिए उसमें आसमान बना देते थे और कुछ तो खाली बैठे बैठे सितारे तक बना देते थे. बचपन की खूबसूरती यही है, भले सूरज के साथ सितारे असल ज़िन्दगी में ना दिखें पर कल्पना में इन दोनों को साथ होने से कोई नहीं रोक सकता। उड़ान शायद इसी का नाम हैं. सूरज और सितारों का साथ होना।

पांवटा की खूबसूरती मुझे तब तक समझ नहीं आई थी जब तक उससे मीलों दूर नहीं चला गया. जब बहुत दूर निकल आया तब मर्म हुआ की आर्ट वाली अध्यापिका के आदेश पर ए 4 साइज़ के पेपर पर जो हम सीनरी बनाया करते थे वह हमारा पांवटा ही तो था. एक ओर शिवालिक दूसरी ओर हिमालय, बीच में पन्ने के एक ओर से निकलती और दूसरे कोने में छुप जाती यमुना। मेरे पन्ने में मेरा घर था, आपके पन्ने  में आपका। फर्क सिर्फ ये था.

अब मेरे जैसे खाना बदोश होली दिवाली पर अपनी उपस्तिथि दर्ज कराने पहुँच जाते हैं. अपने शहर की दूर्दशा पर नाक भों सिकोड़ कर वापस उसी आपा धापी में खो जाते हैं, ये भूल के कि आज हम जो भी हैं उसमें इस शहर का योगदान भी है. और जो इस शहर में आज भी डटे हैं वह उस ए 4 साइज़ के पन्ने में इस शहर को देख नहीं पाते।

इन १५-२० सालों में बहुत कुछ बदला है, और बहुत नए लोग भी आये हैं।  शहर में  बदलाव इस तेज़ी से आया की कब हम उस बदलाव का हिस्सा बन गए ये एहसास ही नहीं हुआ. जीवन में बदलाव  बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन अगर उस बदलाव के  चलते हम अस्तित्व से समझौता करने लगें तो विषय चिंता का बन जाता है. इसीलिए बदलाव  के साथ अस्तित्व की गरिमा बनाये रखना भी बहुत ज़रूरी है. हम ने जागरूकता की कमी और लापरवाही के चलते  बहुत कुछ  खोया है. अगर समय चलते हम ट्रैफिक की समस्या से निबट लेते तो आज भी हमारे बीच केहर सिंह चौहान और अशोक शर्मा जैसे दिग्गज और बुद्धिजीवी सज्जनों का मार्ग दर्शन होता और उन्हें सड़क पर शहादत नही देनी होती।

पांवटा साहिब जैसी  सुन्दर जगह जो की एक वादी में स्तिथ है, जिसकी सीमा से साफ़ नीली यमुना गुज़रती है, में वो सारे तत्व मौजूद हैं जो इसको दुनिया की सबसे खूबसूरत जगहों में शुमार करने की कुव्वत रखते हैं. इस अवसर को हमें यूँ ही पॉलीथिन, कूड़े और ट्रैफिक के हाथों ज़ाया नहीं करना चाहिए।

Clean Paonta Green Paonta एक ऐसा ही अवसर है जिसने सबको एक बार फिर जागरूक किया है. सब में उमड़े इस जोश को देख कर मन गदगद हो जाता है. दिन रात एक कर इस मुहीम को हर तरफ से समर्थन मिल रहा है. हम सब इस समस्या से त्रस्त थे, कमी थी तो एक शुरुआत की।

कई लोग जो इस मुहीम का हिस्सा हैं मेरा उनसे व्यग्तिगत संवाद कम या ना के बराबर रहा लेकिन आज मेरे लिए वो सब हीरो हैं. पंकज भटनागर जी, धीरज चोपड़ा जी, मनिंदर सिंह, निखिल कपिल, रतन प्रीत, इंदरदीप, सुरेश तोमर जी, सुखविंदर जी और पूरी टीम आज सम्मान की हकदार है. इन सब की श्रद्धा, उत्साह और लगन ने आज इन सबको हम सबकी नज़रों में एक नायक के रूप में स्थापित किया है.

प्रशासन की अगुआई में इस मुहीम को एक जबरदस्त प्रोत्साहन मिला है. सुबह सुबह उठ कर तन्मयता से हमारे एस डी एम श्री एच एस राणा जी ने जिस तरह कमान सम्हाली है वो अभूतपूर्व है. एक अच्छी और सफल मुहीम के लिए एक कुशल प्रशासक का नेतृत्व बहुत जरूरी है. इस नेतृत्व ने पांवटा के उन चंद भूतपूर्व एस डी एम की फेहरिस्त में उन्हें शुमार कर दिया है जिन्होंने पांवटा के लिए ना सिर्फ सोचा बल्कि उसे कार्यान्वित भी किया।

अभी इस मुहीम से और बहुत से पांवटा वासियोँ के जुड़ने का इंतज़ार है. क्यूंकि इसको पूर्ण रूप से अमली जामा पहनाने के लिए सबके योगदान की ज़रुरत है. चाहे वो पांवटा के वासी हों या हम जैसे जो हैं तो पांवटा से बाहर लेकिन मन उसी वादी में बसता है. अभी भी कई लोग हैं जिनमें प्रतिभा तो है पर संकोच कर रहे हैं. मेरा अनुरोध है की हम सब राजनितिक, धार्मिक, रंग और व्यक्तिगत भेदभाव से ऊपर उठके इस मुहीम का हिस्सा बनें। चाहे जैसे हो सके अपना योगदान दें. "देखते हैं ये सफाई का नाटक कितने दिन चलता है" से आगे बढ़ कर "कहीं ये जोश ठंडा ना पड़ जाए" पर चिंतित हो अपने सुझाव देकर इसे सफल बनायें।

आप सबका इस पवित्र लक्ष्य को हासिल करने में योगदान बहुत ज़रूरी है, ताकि हमारी आने वाली नस्लें ए 4 साइज के पेपर पर वही खूबसूरत सीनरी बनायें जो हम बनाया करते थे.

- विवेक तिवारी -   

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