पत्रकार साहब को किसी ने पार्टी मैं कूट दिया और उन्होंने बदला लेलिया.
प्रॉब्लम ये नहीं है की क्योँ पिट गए लेकिन प्रॉब्लम इस बात से है की अगर वो पत्रकार नहीं होते तो क्या करते? क्या पत्रकार को सब जायज है? और जो पत्रकार नहीं है उसको कितना तक जायज है? मैं कत्तई इस बात की पैरवी नहीं कर रहा की जिसने पीटा उसने ठीक किया, मैं इस बात की भर्त्सना करता हूँ लेकिन अफ़सोस ये है की ये खबर अपने अख़बार में छाप के अखबार ने अपने हाथ में सहेज के रक्खी ताकत का ग़लत इस्तेमाल किया. अगर आप किसी पत्रकार को धकेलेंगे चाहे उसकी ग़लती हो या न हो, हम आपकी फोटो अखबार में छाप देंगे. ये कैसी पत्रकारिता ये कैसा अख़बार
मैं समझता हूँ की दोनों की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है , पत्रकार होना एक सामाजिक जिम्मेदारी है , अगर पत्रकार पत्रकारिता के साथ न्याय नहीं करता तो वोह समाज का बहुत बड़ा गुनाहगार है , अगर प्रथम पत्रकार संजय ने निष्पछता नहीं दिखाई होती तो आज श्रीमदभागवत गीता का स्वरुप कुछ और होता , एक पत्रकार भी हमारे समाज का हिस्सा है और सामाजिक गतिविधियों और बुराइयों से वह अछूता नहीं रह सकता . यह बात सही है की अतिउत्साहित हो कर कुछ पत्रकार अपनी सीमा लाँघ जाते हैं लेकिन उन्हें उसी पशुता से जबाब देना भी तर्कसंगत नहीं है ,
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