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पुरानी किताब का बचा किस्सा (पार्ट 2)

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…….. अगले दिन स्कूल पहुँचा तो बिट्टू सरदार ने घेर लिया , “ क्योँ बे , तू हमारी तरफ से गया था या उनकी तरफ से आया था ?” मैंने सफाई में कहा , “ धमकी की बात हुई थी , वहाँ तो तुम हड्डियां तोड़ने लगे। ” बिट्टू ने मुझे निकृष्ट नज़रों से देखा और चला गया। बाकी गुट वाले भी नज़रों - ही - नज़रों में मुझे तिरस्कृत कर गए। पंकज मिला , उसने मुझे सांत्वना दी और धन्यवाद भी किया कि मैंने उसे भागने में मदद की। पंकज सज्जन किस्म का व्यक्ति था , जाते - जाते पूछ गया , “ लेकिन , तू आया किसकी तरफ से था ?” यह घटना धीरे - धीरे स्कूल में आग की तरह फैल गई। सबको पता चल गया कि कल हॉस्पिटल के पीछे की गली में क्या हुआ था , लेकिन इसके साथ यह सवाल भी तैरने लगा , मैं किस तरफ से गया था। अब तो यह संशय मुझे भी होने लगा था कि मैं दरअसल गया किस तरफ से था। अब मुझे साबित करना था कि मैं बिट्टू सरदार का आदमी हूँ और इस गिरोह का महत्वपूर्ण सदस्य हूँ , प्लानिंग से लेकर एक्सेक्यूशन ...