"अर्घ्य" का सफर
किसी किताब को विचार से पन्नों पर कैसे लाया जाए इस अनुभव से मैं कोसों दूर रहा. मात्र लेख या किसी कहानी को लिख डालने में, पटकथा को रचने में और किसी किताब को लिखने में काफी फर्क है. और अगर वो किताब किसी का जीवन वृतांत हो तो कार्य विचार से शोध, शोध से संग्रह, संग्रह से संकलन और फिर शब्दों का एक विशाल पर्वत जिसे लेखक रोज़ सुबह से शाम डूब कर अपने छैनी हतौड़े से एक आकृति का रूप देता है. ये आकृति सिर्फ उसे दिख रही होती है, लेकिन धीरे धीरे, अपनी कला से उसे हर ओर से आकार देकर, पॉलिश करते रहना जब तक वो उस इंसान की आंखें न पढ़ ले जिसका जीवन वृतांत मात्र विचार से शुरू हुआ था . लेकिन मूर्तिकार और कथाकार को शायद इस डर में तपते रहना पड़ता है की जो मूरत उसने अपने दिमाग में बनाई है ज़रूरी नहीं की उसकी दिन रात की मेहनत , सालों की तपस्या, अथाह परिश्रम से बनी मूरत ठीक वैसी होगी जैसी पाठक के मस्तिष्क में घूम रही हो. ये अनुभव मुझे तब हुआ जब मेरे पिता ने अपने पिता पर किताब लिखने की ठानी। मेरे लिए ये सटीक अवसर था, अपने पिता को नज़दीक से जानने का. उन्होंने इस कार्य के लिए ऐसे लेखक को चुना जो कभी मेरे दादाजी ...