उफान से उभरा ये ब्लॉग
पिछले एक महीने से कुच्छ लिख नहीं पाया, ऐसा नहीं था की सोच नहीं रहा था, लेकिन वख्त ही नहीं मिला. कभी कभी वख्त न मिलना अच्छा रहता है, इसका निष्कर्ष ये है की मैं काफी व्यस्त था काम को लेकर. मन मैं उन्माद था, जोश था कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश लिए मैं जुटा हुआ था, तभी मुझे एक ठोकर लगी और तब समझ मैं आया की मैं शायद हाथ पाउ तेज़ी से मार रहा था, मुझे सोच समझ कर कदम बढ़ाने चाहिए. इसलिए थोडा आत्म चिंतन ज़रूरी है. ये ब्लॉग लिखना उसी का एक हिस्सा है. पिछले दीनौं मैं अपने एक परम मित्र से बतिया रहा था और मैं चाहता था की हम अपने आने वाले समाये को समझें और कुच्छ ऐसी जगह भी मेहनत करे जहाँ आज तक सोचा ही नहीं. लेकिन मेरे मित्र जो मुझसे उम्र मैं बड़े हैं उन्होंने सलाह दी की उस ओर हमें नहीं चलना चाहिए क्यूंकि उस ओर सुना है बहुत बवाल है. हमारी कोई पोलिटिकल बेक नहीं है और न ही हमारा किसी बड़े उद्योगपति से उठाना बैठना है जो हमारे मदद करे. मैं सुनता रहा और एक बार उनकी बात मान भी गया की शायद हमें उस नामुमकिन काम को नहीं करना चाहिए. पैर तुरंत मेरे मन ने मुझसे सवाल किया और मैंने उनसे पूछ लिया की उन्होंने खुद...