पिछले कई दिनौं से सोच रहा था की आखिर मैं क्योँ अपना ब्लॉग नहीं लिख रहा हूँ. फिर मेरे दिमाग ने उसका उत्तर देदिया की दुनिया मैं आज कल वैसे भी उथल पुथल कम है कौन सा मेरे ब्लॉग लिख देने से वोह उथल पुथल उलट फेर मैं बदल जाएगी? लेकिन इस बात की गारंटी क्या है की मेरे ब्लॉग मैं वोह ताकत नहीं की वोह पूरी दुनिया ही उलट पलट कर दे. क्या पता कर दे? गाहे बगाहे कोई भूला भटका मेरे ब्लॉग को छु के चला जाता है पैर मुझे तोह है उम्मीद की एक दिन मैं भी सब बदल डालूँगा, मौका मिलते ही. आज कल मेरी सोच कुछ ऐसी हो चुकी है, जोश से परिपूर्ण. किसी भी युवा नए गानों पैर थिरकते लड़के से अपने को मैं कम नहीं आंकता, उसके पास उम्र है मेरे पास दिशा. जब तक उसे दिशा दिखेगी तब तक उम्र खो देगा, इसलिए मेरा पलड़ा भारी है. खैर पिछले दिनौं आई पि एल ने धूम मचा दी. मैदान पैर नहीं मैदान के बहार. मज़ा इसलिए आता है क्यूंकि अचानक ये छुट भैये मुद्दे हमारे जीवन के गंभीर मुद्दे बन जाते हैं, जीवन मरण के प्रश्नचिन्ह, या बनवा दिए जाते हैं. शारुख खान को एक मैदान पैर चौकीदार पैर चीखता दिखा दिया, उसका ऑडियो बजा दिया, चौकीदार के घर पहुच गए, उसक...